भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 690

यतते योगमास्थाय मित्रामित्रं विचारयेत् ॥ ३३ ॥ वैसे भिन्न-भिन्न व्यवहारचतुर लोगोंके ऐश्वर्यपर भी शासन करना तभी सम्भव बताया गया है, जब कि राजा मनोयोगका आश्रय ले सदा इसके लिये प्रयत्नशील रहे और कौन मित्र है तथा कौन शत्रु; इसका विचार करता रहे ॥ ३३ ॥

मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः । मा तीक्ष्णो मा मृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ॥ ३४ ॥ मनुष्य कोमल स्वभाववाले राजाका अपमान करते हैं और अत्यन्त कठोर स्वभाववालेसे भी उद्विग्न हो उठते हैं; अतः तुम न कठोर बनो, न कोमल। समय-समयपर कठोरता भी धारण करो और कोमल भी हो जाओ ॥ ३४ ॥

यथा वप्रे वेगवति सर्वतः सम्प्लुतोदके । नित्यं विवरणाद् बाधस्तथा राज्यं प्रमाद्यतः ॥ ३५ ॥ जैसे जलका प्रवाह बड़े वेगसे बह रहा हो और सब ओर जल-ही-जल फैल रहा हो, उस समय नदीतटके विदीर्ण होकर गिर जानेका सदा ही भय रहता है। उसी प्रकार यदि राजा सावधान न रहे तो उसके राज्यके नष्ट होनेका खतरा बना रहता है ॥ ३५ ॥

न बहूनभियुञ्जीत यौगपद्येन शात्रवान् । साम्ना दानेन भेदेन दण्डेन च पुरंदर ॥ ३६ ॥ एकैकमेषां निष्पिष्य शिष्टेषु निपुणं चरेत् । न तु शक्तोऽपि मेधावी सर्वानैवारभेन्नृपः ॥ ३७ ॥ पुरंदर! बहुत-से शत्रुओंपर एक ही साथ आक्रमण नहीं करना चाहिये। साम, दान, भेद और दण्डके द्वारा इन शत्रुओंमेंसे एक-एकको बारी-बारीसे कुचलकर शेष बचे हुए शत्रुको पीस डालनेके लिये कुशलतापूर्वक प्रयत्न आरम्भ करे। बुद्धिमान् राजा शक्तिशाली होनेपर भी सब शत्रुओंको कुचलनेका कार्य एक ही साथ आरम्भ न करे ॥ ३६-३७ ॥

यदा स्यान्महती सेना हयनागरथाकुला । पदातियन्त्रबहुला अनुरक्ता षडङ्गिनी ॥ ३८ ॥ यदा बहुविधां वृद्धिं मन्येत प्रतिलोमतः । तदा विवृत्य प्रहरेद् दस्यूनामविचारयन् ॥ ३९ ॥ जब हाथी, घोड़े और रथोंसे भरी हुई और बहुत-से पैदलों तथा यन्त्रोंसे सम्पन्न, छः-* अंगोंवाली विशाल सेना स्वामीके प्रति अनुरक्त हो, जब शत्रुकि अपेक्षा अपनी अनेक प्रकारसे उन्नति होती जान पड़े, उस समय राजा दूसरा कोई विचार मनमें न लाकर प्रकटरूपसे डाकू और लुटेरोंपर प्रहार आरम्भ कर दे ॥ ३८-३९ ॥

न सामदण्डोपनिषत् प्रशस्यते । न मार्दवं शत्रुषु यात्रिकं सदा । न सस्यघातो न च संकरक्रिया