भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 699

वह दूसरे धनी मनुष्योंको धनके अयोग्य मानता है। इसी कारण उसका यह ईर्ष्याजनक दुःख सदा उसके पीछे लगा रहता है ॥ ३१ ॥ ईर्ष्याभिमानसम्पन्ना राजन् पुरुषमानिनः । कच्चित् त्वं न तथा राजन् मत्सरी कोसलाधिप ॥ ३२ ॥ राजन्! अपनेको पुरुष माननेवाले बहुत-से मनुष्य ईर्ष्या और अहंकारसे भरे होते हैं। कोसलनरेश! क्या तुम ऐसे ईर्ष्यालु तो नहीं हो? ॥ ३२ ॥ सहस्व श्रियमन्येषां यद्यपि त्वयि नास्ति सा । अन्यत्रापि सतीं लक्ष्मीं कुशला भुञ्जते सदा ॥ ३३ ॥ अभिनिष्यन्दते श्रीर्हि सत्यपि द्विषतो जनम् । यद्यपि तुम्हारे पास लक्ष्मी नहीं है तो भी तुम दूसरोंकी सम्पत्ति देखकर सहन करो; क्योंकि चतुर मनुष्य दूसरोंके यहाँ रहनेवाली सम्पत्तिका भी सदा उपभोग करते हैं और जो लोगोंसे द्वेष रखता है, उसके पास सम्पत्ति हो तो भी वह शीघ्र ही नष्ट हो जाती है ॥ श्रियं च पुत्रपौत्रं च मनुष्या धर्मचारिणः । योगधर्मविदो धीराः स्वयमेव त्यजन्त्युत ॥ ३४ ॥ योगधर्मको जाननेवाले धर्मात्मा धीर मनुष्य अपनी सम्पत्ति तथा पुत्र-पौत्रोंका भी स्वयं ही त्याग कर देते हैं ॥ (त्यक्तं स्वायम्भुवे वंशे शुभेन भरतेन च । नानारत्नसमाकीर्णं राज्यं स्फीतमिति श्रुतम् ॥ तथान्यैर्भूमिपालैश्च त्यक्तं राज्यं महोदयम् । त्यक्त्वा राज्यानि सर्वे च वने वन्यफलाशनाः ॥ गताश्च तपसः पारं दुःखस्यान्तं च भूमिपाः ।) बहुसंकुसुकं दृष्ट्वा विधित्सासाधनेन च । तथान्ये संत्यजन्त्येव मत्वा परमदुर्लभम् ॥ ३५ ॥ स्वायम्भुव मनुके वंशमें उत्पन्न हुए शुभ आचार-विचारवाले राजा भरतने नाना प्रकारके रत्नोंसे सम्पन्न अपने समृद्धिशाली राज्यको त्याग दिया था, यह बात मेरे सुननेमें आयी है इसी प्रकार अन्य भूमिपालोंने भी महान् अभ्युदयशाली राज्यका परित्याग किया है। राज्य छोड़कर वे सब-के-सब भूपाल वनमें जंगली फल-मूल खाकर रहते थे। वहीं वे तपस्या और दुःखके पार पहुँच गये। धनकी प्राप्ति निरन्तर प्रयत्नमें लगे रहनेसे होती है, फिर भी वह अत्यन्त अस्थिर है, यह देखकर तथा इसे परम दुर्लभ मानकर भी दूसरे लोग उसका परित्याग कर देते हैं ॥ ३५ ॥ त्वं पुनः प्राज्ञरूपः सन् कृपणं परितप्यसे । अकाम्यान् कामयानोऽर्थान् पराधीनानुपद्रवान् ॥ ३६ ॥