भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 710

तुम्हारा जन्म उच्चकुलमें हुआ है। तुम दयालु, अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता तथा राज्यसंचालनकी कलामें कुशल हो। तुम्हारे-जैसे योग्य पुरुषको कौन अपना मन्त्री नहीं बनायेगा? ॥ ६ ॥

यस्त्वं प्रच्यावितो राज्याद् व्यसनं चोत्तमं गतः ।
आनृशंस्येन वृत्तेन क्षत्रियेच्छसि जीवितुम् ॥ ७ ॥
राजकुमार! तुम्हें राज्यसे भ्रष्ट कर दिया गया है। तुम बड़ी भारी विपत्तिमें पड़ गये हो तथापि तुमने क्रूरताको नहीं अपनाया, तुम दयायुक्त बर्तावसे ही जीवन बिताना चाहते हो ॥ ७ ॥

आगन्ता मद्गृहं तात वैदेहः सत्यसंगरः ।
अथाहं तं नियोक्ष्यामि तत् करिष्यत्यसंशयम् ॥ ८ ॥
तात! सत्यप्रतिज्ञ विदेहराज जनक जब मेरे आश्रमपर पधारेंगे, उस समय मैं उन्हें जो भी आज्ञा दूँगा, उसे वे निःसंदेह पूर्ण करेंगे ॥ ८ ॥

तत आहूय वैदेहं मुनिर्वचनमब्रवीत् ।
अयं राजकुले जातो विदिताभ्यन्तरो मम ॥ ९ ॥
तदनन्तर मुनिने विदेहराज जनकको बुलाकर उनसे इस प्रकार कहा—'राजन्! यह राजकुमार राज-वंशमें उत्पन्न हुआ है, इसकी आन्तरिक बातोंको भी मैं जानता हूँ ॥ ९ ॥

आदर्श इव शुद्धात्मा शारदश्चन्द्रमा यथा ।
नास्मिन् पश्यामि वृजिनं सर्वतो मे परीक्षितः ॥ १० ॥
'इसका हृदय दर्पणके समान शुद्ध और शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्ज्वल है। मैंने इसकी सब प्रकारसे परीक्षा कर ली है। इसमें मैं कोई पाप या दोष नहीं देख रहा हूँ ॥ १० ॥

तेन ते संधिरेवास्तु विश्वासास्मिन् यथा मयि ।
न राज्यमनमात्येन शक्यं शास्तुमपि त्र्यहम् ॥ ११ ॥
'अतः इसके साथ अवश्य ही तुम्हारी संधि हो जानी चाहिये। तुम जैसा मुझपर विश्वास करते हो, वैसा ही इसपर भी करो। कोई भी राज्य बिना मन्त्रीके तीन दिन भी नहीं चलाया जा सकता ॥ ११ ॥

अमात्यः शूर एव स्याद् बुद्धिसम्पन्न एव वा ।
ताभ्यां चैवोभयं राजन् पश्य राज्यप्रयोजनम् ॥ १२ ॥
'मन्त्री वही हो सकता है, जो शूरवीर अथवा बुद्धिमान् हो। शौर्य और बुद्धिसे ही लोक और परलोक दोनोंका सुधार होता है। राजन्! उभयलोककी सिद्धि ही राज्यका प्रयोजन है। इसे अच्छी तरह देखो और समझो ॥ १२ ॥