भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 716

जिस उपायसे उसे सुहृदोंकी प्राप्ति होती है—ये सारी बातें सुननेके लिये मेरी बड़ी इच्छा है॥ ७॥

भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलक्षये । मन्त्रसंवरणं दुःखं बहूनामिति मे मतिः ॥ ८॥ मैं देखता हूँ, संघबद्ध राज्योंके विनाशका मूल कारण है आपसकी फूट। मेरा विश्वास है कि बहुत-से मनुष्योंके जो समुदाय हैं, उनके लिये किसी गुप्त मन्त्रणा या विचारको छिपाये रखना बहुत ही कठिन है॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं निखिलेन परंतप । यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे वद पार्थिव ॥ ९ ॥ 'परंतप राजन्! इन सारी बातोंको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ। किस प्रकार वे संघ या गण आपसमें फूटते नहीं हैं, यह मुझे बताइये ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

गणानां च कुलानां च राज्ञां भरतसत्तम । वैरसंदीपनावेतौ लोभामर्षौ नराधिप ॥ १० ॥ भीष्मजीने कहा—भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! गणोंमें, कुलोंमें तथा राजाओंमें वैरकी आग प्रज्वलित करनेवाले ये दो ही दोष हैं—लोभ और अमर्ष ॥ १० ॥

लोभमेको हि वृणुते ततोऽमर्षमनन्तरम् । तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ ॥ ११॥ पहले एक मनुष्य लोभका वरण करता है (लोभवश दूसरेका धन लेना चाहता है), तदनन्तर दूसरेके मनमें अमर्ष पैदा होता है; फिर वे दोनों लोभ और अमर्षसे प्रभावित हुए व्यक्ति समुदाय, धन और जनकी बड़ी भारी हानि उठाकर एक-दूसरेके विनाशक बन जाते हैं॥ ११ ॥

चारमन्त्रबलादानैः सामदानविभेदनैः । क्षयव्ययभयोपायैः प्रकर्षन्तीतरेतरम् ॥ १२॥ वे भेद लेनेके लिये गुप्तचरोंको भेजते हैं, गुप्त मन्त्रणाएँ करते तथा सेना एकत्र करनेमें लग जाते हैं। साम, दान और भेदनीतिके प्रयोग करते हैं, तथा जन-संहार, अपार धनराशिके व्यय एवं अनेक प्रकारके भय उपस्थित करनेवाले विविध उपायोंद्वारा एक-दूसरेको दुर्बल कर देते हैं ॥ १२ ॥

तत्रादानेन भिद्यन्ते गणाः संघातवृत्तयः । भिन्ना विमनसः सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भयात् ॥ १३ ॥ संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले गणराज्यके सैनिकोंको भी यदि समयपर भोजन और वेतन न मिले तो भी वे फूट जाते हैं। फूट जानेपर सबके मन एक-दूसरेके