भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 728

(अहिंसा सत्यमक्रोधस्तपो दानं दमो मतिः । अनसूयाप्यमात्सर्यमनीर्ष्या शीलमेव च ।। एष धर्मः कुरुश्रेष्ठ कथितः परमेष्ठिना । ब्रह्मणा देवदेवेन अयं चैव सनातनः ।। अस्मिन् धर्मे स्थितो राजन् नरो भद्राणि पश्यति ।)

राजन्! कुरुश्रेष्ठ! अहिंसा, सत्य, अक्रोध, तपस्या दान, मन, और इन्द्रियोंका संयम, विशुद्ध बुद्धि, किसीके दोष न देखना, किसीसे डाह और जलन न रखना तथा उत्तम शीलस्वभावका परिचय देना—ये धर्म हैं, देवाधिदेव परमेष्ठी ब्रह्माजीने इन्हींको सनातन धर्म बताया है। जो मनुष्य इस सनातन धर्ममें स्थित है, उसे ही कल्याणका दर्शन होता है ।।

श्रुतिधर्म इति ह्येके नेत्याहुरपरे जनाः । न च तत्प्रत्यसूयामो न हि सर्वं विधीयते ।। १३ ।।

वेदमें जिसका प्रतिपादन किया गया है, वही धर्म है, यह एक श्रेणीके विद्वानोंका मत है; किंतु दूसरे लोग धर्मका यह लक्षण नहीं स्वीकार करते हैं। हम किसी भी मतपर दोषारोपण नहीं करते। इतना अवश्य है कि वेदमें सभी बातोंका विधान नहीं है ।। १३ ।।

येऽन्यायेन जिहीर्षन्तो धनमिच्छन्ति कस्यचित् । तेभ्यस्तु न तदाख्येयं स धर्म इति निश्चयः ।। १४ ।।

जो अन्यायसे अपहरण करनेकी इच्छा रखकर किसी धनीके धनका पता लगाना चाहते हों, उन लुटेरोंसे उसका पता न बतावे और यही धर्म है, ऐसा निश्चय रखे ।। १४ ।।

अकूजनेन चेन्मोक्षो नावकूजेत् कथंचन । अवश्यं कूजितव्ये वा शङ्केरेन् वाप्यकूजनात् ।। १५ ।। श्रेयस्तत्रानृतं वक्तुं सत्यादिति विचारितम् ।

यदि न बतानेसे उस धनीका बचाव हो जाता हो तो किसी तरह वहाँ कुछ बोले ही नहीं; परंतु यदि बोलना अनिवार्य हो जाय और न बोलनेसे लुटेरोंके मनमें संदेह पैदा होने लगे तो वहाँ सत्य बोलनेकी अपेक्षा झूठ बोलनेमें ही कल्याण है; यही इस विषयमें विचारपूर्वक निर्णय किया गया है ।। १५ १/२ ।।

यः पापैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथदपि ।। १६ ।। न तेभ्योऽपि धनं देयं शक्ये सति कथंचन । पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेत् ।। १७ ।।

यदि शपथ खा लेनेसे भी पापियोंके हाथसे छुटकारा मिल जाय तो वैसा ही करे। जहाँतक वश चले, किसी तरह भी पापियोंके हाथमें धन न जाने दे; क्योंकि पापाचारियोंको दिया हुआ धन दाताको भी पीड़ित कर देता है ।। १६-१७ ।।

स्वशरीरोपरोधेन धनमादातुमिच्छतः । सत्यसम्प्रतिपत्त्यर्थं यद् ब्रूयुः साक्षिणः क्वचित् ।। १८ ।।