भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 734

जो तपस्या करते, कुमारावस्थासे ही ब्रह्मचर्यके पालनमें तत्पर रहते और विद्या एवं वेदोंके अध्ययन-सम्बन्धी व्रतको पूर्ण करके स्नातक हो चुके हैं, वे दुस्तर दुःखोंको तर जाते हैं॥ १४ ॥

ये च संशान्तरजसः संशान्ततमसश्च ये । सत्त्वे स्थिता महात्मानो दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १५ ॥ जिनके रजोगुण और तमोगुण शान्त हो गये हों तथा जो विशुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित हैं, वे महात्मा दुर्लंघ्य संकटोंको भी लाँघ जाते हैं॥ १५ ॥

येषां न कश्चित् त्रसति न त्रसन्ति हि कस्यचित् । येषामात्मसमो लोको दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १६ ॥ जिनसे कोई भयभीत नहीं होता, जो स्वयं भी किसीसे भय नहीं मानते तथा जिनकी दृष्टिमें यह सारा जगत् अपने आत्माके ही तुल्य है, वे दुस्तर संकटोंसे तर जाते हैं॥ १६ ॥

परश्रिया न तप्यन्ति ये सन्तः पुरुषर्षभाः । ग्राम्यादर्थान्निवृत्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १७ ॥ जो दूसरोंकी सम्पत्तिसे ईर्ष्यावश जलते नहीं हैं और ग्राम्य विषय-भोगसे निवृत्त हो गये हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ साधु पुरुष दुस्तर विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥

सर्वान् देवान् नमस्यन्ति सर्वधर्मांश्च शृण्वते । ये श्रद्दधानाः शान्ताश्च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १८ ॥ जो सब देवताओंको प्रणाम करते और सभी धर्मोंको सुनते हैं, जिनमें श्रद्धा और शान्ति विद्यमान है, वे सम्पूर्ण दुःखोंसे पार हो जाते हैं॥ १८ ॥

ये न मानित्वमिच्छन्ति मानयन्ति च ये परान् । मान्यमानान् नमस्यन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ १९ ॥ जो दूसरोंसे सम्मान नहीं चाहते, जो स्वयं ही दूसरोंको सम्मान देते हैं और सम्माननीय पुरुषोंको नमस्कार करते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥

ये च श्राद्धानि कुर्वन्ति तिथ्यां तिथ्यां प्रजार्थिनः । सुविशुद्धेन मनसा दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २० ॥ जो संतानकी इच्छा रखकर प्रत्येक तिथिपर विशुद्ध हृदयसे पितरोंका श्राद्ध करते हैं, वे दुर्गम विपत्तिसे छुटकारा पा जाते हैं॥ २० ॥

ये क्रोधं संनियच्छन्ति क्रुद्धान्संशमयन्ति च । न च कुप्यन्ति भूतानां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २१ ॥ जो क्रोधको काबूमें रखते हैं, क्रोधी मनुष्योंको शान्त करते और स्वयं किसी भी प्राणीपर कुपित नहीं होते हैं, वे दुर्लंघ्य संकटोंसे पार हो जाते हैं॥ २१ ॥

मधु मांसं च ये नित्यं वर्जयन्तीह मानवाः । जन्मप्रभृति मद्यं च दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ २२ ॥