महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 761, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरोक्षमें परनिन्दा करनेवाला मनुष्य सैकड़ों मनुष्योंको जो कुछ दान देता है और होम करता है, उन सब अपने कर्मोंको तत्काल नष्ट कर देता है ।। १३ ।। तस्मात् प्राज्ञो नरः सद्यस्तादृशं पापचेतसम् । वर्जयेत् साधुभिर्वर्ज्यं सारमेयामिषं यथा ।। १४ ।। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह वैसे पापपूर्ण विचारवाले पुरुषको तत्काल त्याग दे। वह कुत्तेके मांसके समान साधु पुरुषोंके लिये सदा ही त्याज्य है ।। परिवादं ब्रुवाणो हि दुरात्मा वै महाजने । प्रकाशयति दोषांस्तु सर्पः फणमिवोच्छ्रितम् ।। १५ ।। जैसे साँप अपने फनको ऊँचा उठाकर प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जनसमुदायमें किसी महापुरुषकी निन्दा करनेवाला दुरात्मा अपने ही दोषोंको प्रकट करता है ।। तं स्वकर्माणि कुर्वाणं प्रतिकर्तुं य इच्छति । भस्मकूट इवाबुद्धिः खरो रजसि सज्जति ।। १६ ।। जो परनिन्दारूप अपना कार्य करनेवाले दुष्ट पुरुषसे बदला लेना चाहता है, वह राखमें लोटनेवाले मूर्ख गदहेके सामन केवल दुःखमें निमग्न होता है ।। १६ ।। मनुष्यशालावृकमप्रशान्तं जनापवादे सततं निविष्टम् । मातङ्गमुन्मत्तमिवोन्नदन्तं त्यजेत तं श्वानमिवातिरौद्रम् ।। १७ ।। जो सदा लोगोंकी निन्दामें ही तत्पर रहता है, वह मनुष्यके शरीररूप घरमें रहनेवाला भेड़िया है। वह सदा अशान्त बना रहता है। मतवाले हाथीके समान चीत्कार करता है और अत्यन्त भयंकर कुत्तेके समान काटनेको दौड़ता है। श्रेष्ठ पुरुषको चाहिये कि उसे सदाके लिये त्याग दे ।। १७ ।। अधीरजुष्टे पथि वर्तमानं दमादपेतं विनयाच्च पापम् । अरिव्रतं नित्यमभूतिकामं धिगस्तु तं पापमतिं मनुष्यम् ।। १८ ।। वह मूर्खोंद्वारा सेवित पथपर चलनेवाला है। इन्द्रिय-संयम और विनयसे कोसों दूर है। उसने शत्रुताका व्रत ले रखा है। वह सदा सबकी अवनति चाहता है। उस पापात्मा एवं पापबुद्धि मनुष्यको धिक्कार है ।। १८ ।। प्रत्युच्यमानस्त्वभिभूय एभि- र्निशाम्य मा भूस्त्वमथार्तरूपः । उच्चस्य नीचेन हि सम्प्रयोगं विगर्हयन्ति स्थिरबुद्धयो ये ।। १९ ।।