भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 772

अथाजगाम तं देशं केसरी केसरारुणः । गिरिकन्दरजो भीमः सिंहो नागकुलान्तकः ॥ ७ ॥ तदनन्तर उस प्रदेशमें एक केसरी सिंह आया, जो अपनी केसरके कारण कुछ लाल-सा जान पड़ता था। पर्वतकी कन्दरामें पैदा हुआ वह भयानक सिंह गजवंशका विनाश करनेवाला काल था ॥ ७ ॥

तं दृष्ट्वा सिंहमायान्तं नागः सिंहभयार्दितः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानो भयातुरः ॥ ८ ॥ उस सिंहको आते देख वह हाथी उसके भयसे पीड़ित एवं आतुर हो थर-थर काँपने लगा और ऋषिकी शरणमें गया ॥ ८ ॥

स ततः सिंहतां नीतो नागेन्द्रो मुनिना तदा । वन्यं नागणयत् सिंहं तुल्यजातिसमन्वयात् ॥ ९ ॥ तब मुनिने उस गजराजको सिंह बना दिया। अब वह समान जातिके सम्बन्धसे जंगली सिंहको कुछ भी नहीं गिनता था ॥ ९ ॥

दृष्ट्वा च सोऽभवत् सिंहो वन्यो भयसमन्वितः । स चाश्रमेऽवसत् सिंहस्तस्मिन्नेव महावने ॥ १० ॥ उसे देखकर जंगली सिंह स्वयं ही डर गया। वह सिंह बना हुआ कुत्ता महावनमें उसी आश्रममें रहने लगा ॥ १० ॥

तद्भयात् पशवो नान्ये तपोवनसमीपतः । व्यदृश्यन्त तदा त्रस्ता जीविताकांक्षिणस्तथा ॥ ११ ॥ उसके भयसे जंगलके दूसरे पशु डर गये और अपनी जान बचानेकी इच्छासे तपोवनके समीप कभी नहीं दिखायी दिये ॥ ११ ॥

कदाचित् कालयोगेन सर्वप्राणिविहिंसकः । बलवान् क्षतजाहारो नानासत्त्वभयंकरः ॥ १२ ॥ अष्टपाद्दूर्ध्वनयनः शरभो वनगोचरः । तं सिंहं हन्तुमागच्छन्मुनेस्तस्य निवेशनम् ॥ १३ ॥ तदनन्तर कालयोगसे वहाँ एक बलवान् वनवासी समस्त प्राणियोंका हिंसक शरभ आ पहुँचा, जिसके आठ पैर और ऊपरकी ओर नेत्र थे। वह रक्त पीनेवाला जानवर नाना प्रकारके वन-जन्तुओंके मनमें भय उत्पन्न कर रहा था। वह उस सिंहको मारनेके लिये मुनिके आश्रमपर आया ॥ १२-१३ ॥

(तं दृष्ट्वा शरभं यान्तं सिंहः परभयातुरः । ऋषिं शरणमापेदे वेपमानः कृताञ्जलिः ॥) शरभको आते देख सिंह अत्यन्त भयसे व्याकुल हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर मुनिकी शरणमें आया ॥