भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 779

उपार्जनमें कुशलतापूर्वक लगा रहे ॥ २२ ॥ राजा गुणशताकीर्ण एष्टव्यस्तादृशो भवेत् । योधाश्चैव मनुष्येन्द्र सर्वे गुणगणैर्वृताः ॥ २३ ॥ अन्वेष्टव्याः सुपुरुषाः सहाया राज्यधारणे । न विमानयितव्यास्ते राज्ञा वृद्धिमभीप्सता ॥ २४ ॥ ऐसे सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न राजा ही प्रजाके लिये वांछनीय होता है। नरेन्द्र! राज्यकी रक्षामें सहायता देनेवाले समस्त सैनिक भी इसी प्रकार श्रेष्ठ गुण-समूहोंसे सम्पन्न होने चाहिये, इस कार्यके लिये अच्छे पुरुषोंकी ही खोज करनी चाहिये तथा अपनी उन्नतिकी इच्छा रखनेवाले राजाको कभी अपने सैनिकोंका अपमान नहीं करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ योधाः समरशौटीराः कृतज्ञाः शस्त्रकोविदाः । धर्मशास्त्रसमायुक्ताः पदातिजनसंवृताः ॥ २५ ॥ अभया गजपृष्ठस्था रथचर्याविशारदाः । इष्वस्त्रकुशला यस्य तस्येयं नृपतेर्मही ॥ २६ ॥ जिसके योद्धा युद्धमें वीरता दिखानेवाले, कृतज्ञ, शस्त्र चलानेकी कलामें कुशल, धर्मशास्त्रके ज्ञानसे सम्पन्न, पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए, निर्भय, हाथीकी पीठपर बैठकर युद्ध करनेमें समर्थ, रथचर्यामें निपुण तथा धनुर्विद्यामें प्रवीण होते हैं, उसी राजाके अधीन इस भूमण्डलका राज्य होता है ॥ २५-२६ ॥ (ज्ञातीनामनवज्ञानं भृत्येष्वशठता सदा । नैपुण्यं चार्थचर्यासु यस्यैते तस्य सा मही ॥ जो जातिभाइयोंका अपमान तथा सेवकोंके प्रति शठता कभी नहीं करता और कार्यसाधनमें कुशल है, उसी राजाके अधिकारमें यह पृथ्वी रहती है ॥ आलस्यं चैव निद्रा च व्यसनान्यतिहास्यता । यस्यैतानि न विद्यन्ते तस्यैव सुचिरं मही ॥ जिस राजामें आलस्य, निद्रा, दुर्व्यसन तथा अत्यन्त हास्यप्रियता—ये दुर्गुण नहीं हैं, उसीके अधिकारमें यह पृथ्वी दीर्घकालतक रहती है ॥ वृद्धसेवी महोत्साहो वर्णानां चैव रक्षिता । धर्मचर्याः सदा यस्य तस्येयं सुचिरं मही ॥ जो बड़े-बूढ़ोंको सेवा करनेवाला, महान् उत्साही, चारों वर्णोंका रक्षक तथा सदा धर्माचरणमें तत्पर रहता है, उसीके पास यह पृथ्वी चिरकालतक स्थिर रहती है ॥ नीतिमार्गानुसरणं नित्यमुत्थानमेव च । रिपूणामनवज्ञानं तस्येयं सुचिरं मही ॥ जो राजा नीतिमार्गका अनुसरण करता, सदा ही उद्योगमें तत्पर रहता और शत्रुओंकी अवहेलना नहीं करता, उसके अधिकारमें दीर्घकालतक इस पृथ्वीका राज्य बना रहता है ॥