भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

दण्डके स्वरूप, नाम, लक्षण, प्रभाव और प्रयोगका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

अयं पितामहेनोक्तो राजधर्मः सनातनः ।
ईश्वरश्च महादण्डो दण्डे सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! आपने यह सनातन राजधर्मका वर्णन किया है। इसके अनुसार महान् दण्ड ही सबका ईश्वर है, दण्डके ही आधारपर सब कुछ टिका हुआ है ॥ १ ॥
देवतानामृषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
यक्षरक्षःपिशाचानां साध्यानां च विशेषतः ॥ २ ॥
सर्वेषां प्राणिनां लोके तिर्यग्योनिनिवासिनाम् ।
सर्वव्यापी महातेजा दण्डः श्रेयानिति प्रभो ॥ ३ ॥
प्रभो! देवता, ऋषि, पितर, महात्मा, यक्ष, राक्षस, पिशाच तथा साध्यगण एवं पशु-पक्षियोंकी योनिमें निवास करनेवाले जगत्के समस्त प्राणियोंके लिये भी सर्वव्यापी महातेजस्वी दण्ड ही कल्याणका साधन है ।।
इत्येवमुक्तं भवता दण्डे वै सचराचरम् ।
पश्यता लोकमासक्तं ससुरासुरमानुषम् ।
एतदिच्छाम्यहं ज्ञातुं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ४ ॥
देवता, असुर और मनुष्योंसहित इस सम्पूर्ण विश्वको अपने समीप देखते हुए आपने कहा है कि दण्डपर ही चराचर जगत् प्रतिष्ठित है। भरतश्रेष्ठ! मैं यथार्थ रूपसे यह सब जानना चाहता हूँ ॥ ४ ॥
को दण्डः कीदृशो दण्डः किंरूपः किंपरायणः ।
किमात्मकः कथंभूतः कथमूर्तिः कथं प्रभो ॥ ५ ॥
दण्ड क्या है? कैसा है? उसका स्वरूप किस तरहका है? और किसके आधारपर उसकी स्थिति है? प्रभो! उसका उपादान क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे हुई है? उसका आकार कैसा है? ॥ ५ ॥
जागर्ति च कथं दण्डः प्रजास्ववहितात्मकः ।
कश्च पूर्वापरमिदं जागर्ति प्रतिपालयन् ॥ ६ ॥
वह किस प्रकार सावधान रहकर सम्पूर्ण प्राणियोंपर शासन करनेके लिये जागता रहता है? कौन इस पूर्वापर जगत्का प्रतिपालन करता हुआ जागता है? ॥ ६ ॥
कश्च विज्ञायते पूर्वं को वरो दण्डसंज्ञितः ।