महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 798, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंदण्डका ठीक-ठीक उपयोग होनेपर राजाके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि सदा होती रहती है। इसलिये दण्ड महान् देवता है, यह अग्निके समान तेजस्वी रूपसे प्रकट हुआ है॥ १४॥
नीलोत्पलदलश्यामश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ।
अष्टपान्नैंकनयनः शंकुकर्णोर्ध्वरोमवान् ॥ १५ ॥
इसके शरीरकी कान्ति नील कमलदलके समान श्याम है, इसके चार दाढ़ें और चार भुजाएँ हैं। आठ पैर और अनेक नेत्र हैं। इसके कान खूँटेके समान हैं और रोएँ ऊपरकी ओर उठे हुए हैं॥ १५॥
जटी द्विजिह्वस्ताम्रास्यो मृगराजतनुच्छदः ।
एतद् रूपं बिभर्त्युग्रं दण्डो नित्यं दुराधरः ॥ १६ ॥
इसके सिरपर जटा है, मुखमें दो जिह्वाएँ हैं, मुखका रंग ताँबेके समान है, शरीरको ढकनेके लिये उसने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है, इस प्रकार दुर्धर्ष दण्ड सदा यह भयंकर रूप धारण किये रहता है³॥
असिर्धनुर्गदा शक्तिस्त्रिशूलं मुद्गरः शरः ।
मुसलं परशुश्चक्रं पाशो दण्डर्ष्टितोमराः ॥ १७ ॥
सर्वप्रहरणीयानि सन्ति यानीह कानिचित् ।
दण्ड एव स सर्वात्मा लोके चरति मूर्तिमान् ॥ १८ ॥
खड्ग, धनुष, गदा, शक्ति, त्रिशूल, मुद्गर, बाण, मुसल, परसा, चक्र, पाश, दण्ड, ऋष्टि, तोमर तथा दूसरे-दूसरे जो कोई प्रहार करनेयोग्य अस्त्र-शस्त्र हैं, उन सबके रूपमें सर्वात्मा दण्ड ही मूर्तिमान् होकर जगत्में विचरता है॥ १७-१८॥
भिन्दंश्छिन्दन् रुजन् कृन्तन् दारयन् पाटयंस्तथा ।
घातयन्नभिधावंश्च दण्ड एव चरत्युत ॥ १९ ॥
वही अपराधियोंको भेदता, छेदता, पीड़ा देता, काटता, चीरता, फाड़ता तथा मरवाता है। इस प्रकार दण्ड ही सब ओर दौड़ता-फिरता है॥ १९॥
असिर्विशसनो धर्मस्तीक्ष्णवर्मा दुराधरः ।
श्रीगर्भो विजयः शास्ता व्यवहारः सनातनः ॥ २० ॥
शास्त्रं ब्राह्मणमन्त्राश्च शास्ता प्राग्वदतां वरः ।
धर्मपालोऽक्षरो देवः सत्यगो नित्यगोऽग्रजः ॥ २१ ॥
असङ्गो रुद्रतनयो मनुज्येष्ठः शिवंकरः ।
नामान्येतानि दण्डस्य कीर्तितानि युधिष्ठिर ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! असि, विशसन, धर्म, तीक्ष्णवर्मा, दुराधर, श्रीगर्भ, विजय, शास्ता, व्यवहार, सनातन, शास्त्र, ब्राह्मण, मन्त्र, शास्ता, प्राग्वदतांवर, धर्मपाल, अक्षर, देव, सत्यग, नित्यग,