भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 801

है ॥ ४० ॥ ईश्वरः पुरुषः प्राणः सत्त्वं चित्तं प्रजापतिः । भूतात्मा जीव इत्येवं नामभिः प्रोच्यतेऽष्टभिः ॥ ४१ ॥ ईश्वर, पुरुष, प्राण, सत्त्व, चित्त, प्रजापति, भूतात्मा तथा जीव—इन आठ नामोंसे दण्डका ही प्रतिपादन किया जाता है ॥ ४१ ॥ अददद् दण्डमेवास्मै धृतमैश्वर्यमेव च । बलेन यश्च संयुक्तः सदा पञ्चविधात्मकः ॥ ४२ ॥ जो सर्वदा सैनिक-बलसे सम्पन्न है तथा जो धर्म, व्यवहार, दण्ड, ईश्वर और जीवरूपसे पाँच* प्रकारके स्वरूप धारण करता है, उस राजाको ईश्वरने ही दण्डनीति तथा अपना ऐश्वर्य प्रदान किया है ॥ ४२ ॥ कुलं बहुधनामात्याः प्रज्ञा प्रोक्ता बलानि तु । आहार्यमष्टकैर्द्रव्यैर्बलमन्यद् युधिष्ठिर ॥ ४३ ॥ युधिष्ठिर! राजाका बल दो तरह का होता है—एक प्राकृत और दूसरा आहार्य। उनमेंसे कुल, प्रचुर धन, मन्त्री तथा बुद्धि—ये चार प्राकृतिक बल कहे गये हैं, आहार्य बल उससे भिन्न है। वह निम्नांकित आठ वस्तुओंके द्वारा आठ प्रकारका माना गया है ॥ ४३ ॥ हस्तिनोऽश्वा रथाः पत्तिर्नावो विष्टिस्तथैव च । दैशिकाश्चाविकाश्चैव तदष्टाङ्गं बलं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ हाथी, घोड़े, रथ, पैदल, नौका, बेगार, देशकी प्रजा तथा भेड़ आदि पशु—ये आठ अंगोंवाला बल आहार्य माना गया है ॥ ४४ ॥ अथवाङ्गस्य युक्तस्य रथिनो हस्तियायिनः । अश्वारोहाः पदाताश्च मन्त्रिणो रसदाश्च ये ॥ ४५ ॥ भिक्षुकाः प्राड्विवाकाश्च मौहूर्ता दैवचिन्तकाः । कोशो मित्राणि धान्यं च सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥ सप्तप्रकृति चाष्टाङ्गं शरीरमिह यद् विदुः । राज्यस्य दण्डमेवाङ्गं दण्डः प्रभव एव च ॥ ४७ ॥ अथवा संयुक्त अंगके रथी, हाथीसवार, घुड़सवार, पैदल, मन्त्री, वैद्य, भिक्षुक, वकील, ज्योतिषी, दैवज्ञ, कोश, मित्र, धान्य तथा अन्य सब सामग्री, राज्यकी सात प्रकृतियाँ (स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोश, राष्ट्र, दुर्ग और सेना) और उपर्युक्त आठ अंगोंसे युक्त बल—इन सबको राज्यका शरीर माना गया है। इन सबमें दण्ड ही प्रधान अंग है, क्योंकि दण्ड ही सबकी उत्पत्तिका कारण है ॥ ४५—४७ ॥ ईश्वरेण प्रयत्नेन कारणात् क्षत्रियस्य च । दण्डो दत्तः समानात्मा दण्डो हीदं सनातनम् ॥ ४८ ॥