महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 803, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यवहारः प्रजागोप्ता ब्रह्मदिष्टो युधिष्ठिर ।
त्रीन् धारयति लोकान् वै सत्यात्मा भूतिवर्धनः ॥ ५५ ॥
युधिष्ठिर! ब्रह्माजीका बताया हुआ जो प्रजा-रक्षक व्यवहार है, वह सत्यस्वरूप होनेके साथ ही ऐश्वर्यकी वृद्धि करनेवाला है, वही तीनों लोकोंको धारण करता है ॥ ५५ ॥
यश्च दण्डः स दृष्टो नो व्यवहारः सनातनः ।
व्यवहारश्च दृष्टो यः स वेद इति निश्चितम् ॥ ५६ ॥
जो दण्ड है, वही हमारी दृष्टिमें सनातन व्यवहार है। जो व्यवहार देखा गया है, वही वेद है, यह निश्चितरूपसे कहा जा सकता है ॥ ५६ ॥
यश्च वेदः स वै धर्मो यश्च धर्मः स सत्पथः ।
ब्रह्मा पितामहः पूर्वं बभूवाथ प्रजापतिः ॥ ५७ ॥
जो वेद है, वही धर्म है और जो धर्म है, वही सत्पुरुषोंका सन्मार्ग है। सत्पुरुष हैं लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी, जो सबसे पहले प्रकट हुए थे ॥ ५७ ॥
लोकानां स हि सर्वेषां ससुरासुररक्षसाम् ।
समनुष्योरगवतां कर्ता चैव स भूतकृत् ॥ ५८ ॥
वे ही देवता, मनुष्य, नाग, असुर तथा राक्षसोंसहित सम्पूर्ण लोकोंके कर्ता तथा समस्त प्राणियोंके स्रष्टा हैं ॥
ततोऽन्यो व्यवहारोऽयं भर्तृप्रत्ययलक्षणः ।
तस्मादिदमथोवाच व्यवहारनिदर्शनम् ॥ ५९ ॥
उन्हींसे भर्तृप्रत्यय नामक इस अन्य प्रकारके दण्डकी प्रवृत्ति हुई; फिर उन्होंने ही इस व्यवहारके लिये यह आदर्श वाक्य कहा— ॥ ५९ ॥
माता पिता च भ्राता च भार्या चैव पुरोहितः ।
नादण्ड्यो विद्यते राज्ञो यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥ ६० ॥
'माता, पिता, भाई, स्त्री तथा पुरोहित कोई भी क्यों न हो, जो अपने धर्ममें स्थिर नहीं रहता, उसे राजा अवश्य दण्ड दे, राजाके लिये कोई भी अदण्डनीय नहीं है' ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि दण्डस्वरूपाधिकथने
एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें दण्डके स्वरूपका वर्णनविषयक एक सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२१ ॥
१- 'विगतः अवहारः धर्मस्य येन सः व्यवहारः'। दूर हो गया है धर्मका अवहार (लोप) जिसके द्वारा, वह व्यवहार है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार धर्मको लुप्त होनेसे बचाना ही व्यवहारका व्यवहारत्व है।