महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 809, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविशाल नेत्रोंवाले सनातन महात्मा महादेवजीने अपने आपको रुद्रोंका अधीश्वर तथा शक्तिशाली संरक्षक बनाया ॥ ३० ॥
वसिष्ठमीशं विप्राणां वसूनां जातवेदसम् । तेजसां भास्करं चक्रे नक्षत्राणां निशाकरम् ॥ ३१ ॥ वसिष्ठको ब्राह्मणोंका, जातवेदा अग्निको वसुओंका, सूर्यको तेजस्वी ग्रहोंका और चन्द्रमाको नक्षत्रोंका अधिपति बनाया ॥ ३१ ॥
वीरुधामंशुमन्तं च भूतानां च प्रभुं वरम् । कुमारं द्वादशभुजं स्कन्दं राजानमादिशत् ॥ ३२ ॥ अंशुमान्को लताओंका तथा बारह भुजाओंसे विभूषित शक्तिशाली कुमार स्कन्दको भूतोंका श्रेष्ठ राजा नियुक्त किया ॥ ३२ ॥
कालं सर्वेशमकरोत् संहारविनयात्मकम् । मृत्योश्चतुर्विभागस्य दुःखस्य च सुखस्य च ॥ ३३ ॥ संहार और विनय (उत्पादन) जिसका स्वरूप है, उस सर्वेश्वर कालको चार प्रकारकी मृत्युका, सुखका और दुःखका भी स्वामी बनाया ॥ ३३ ॥
ईश्वरः सर्वदेवस्तु राजराजो नराधिपः । सर्वेषामेव रुद्राणां शूलपाणिरिति श्रुतिः ॥ ३४ ॥ सबके देवता, राजाओंके राजा और मनुष्योंके अधिपति शूलपाणि भगवान् शिव स्वयं समस्त रुद्रोंके अधीश्वर हुए। ऐसा सुना जाता है ॥ ३४ ॥
तमेनं ब्रह्मणः पुत्रमनुजातं क्षुपं ददौ । प्रजानामधिपं श्रेष्ठं सर्वधर्मभृतामपि ॥ ३५ ॥ ब्रह्माजीके छोटे पुत्र क्षुपको उन्होंने समस्त प्रजाओं तथा सम्पूर्ण धर्मधारियोंका श्रेष्ठ अधिपति बना दिया ॥ ३५ ॥
महादेवस्ततस्तस्मिन् वृत्ते यज्ञे यथाविधि । दण्डं धर्मस्य गोप्तारं विष्णवे सत्कृतं ददौ ॥ ३६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजीका वह यज्ञ जब विधिपूर्वक सम्पन्न हो गया, तब महादेवजीने धर्मरक्षक भगवान् विष्णुका सत्कार करके उन्हें वह दण्ड समर्पित किया ॥ ३६ ॥
विष्णुरङ्गिरसे प्रादादङ्गिरा मुनिसत्तमः । प्रादादिन्द्रमरीचिभ्यां मरीचिर्भार्गवे ददौ ॥ ३७ ॥ भगवान् विष्णुने उसे अंगिराको दे दिया। मुनिवर अंगिराने इन्द्र और मरीचिको दिया और मरीचिने भृगुको सौंप दिया ॥ ३७ ॥
भृगुर्ददावृषिभ्यस्तु दण्डं धर्मसमाहितम् । ऋषयो लोकपालेभ्यो लोकपालाः क्षुपाय च ॥ ३८ ॥ क्षुपस्तु मनवे प्रादादादित्यतनयाय च ।