महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 816, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपध्वस्तस्त्ववमतो दुःखं जीवितमृच्छति । जीवेच्च यदपध्वस्तस्तच्छुद्रं मरणं भवेत् ॥ १९ ॥ वह अपने पदसे भ्रष्ट और अपमानित होकर दुःखमय जीवन बिताता है। यदि पदभ्रष्ट होकर भी वह जीता है तो वह जीवन भी स्पष्टरूपमें मरण ही है ॥ १९ ॥
अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिगर्हणम् । सेवितव्या त्रयी विद्या सत्कारो ब्राह्मणेषु च ॥ २० ॥ इस अवस्थामें आचार्यगण उसके लिये यह कर्तव्य बतलाते हैं कि वह अपने पापोंकी निन्दा करे, वेदोंका निरन्तर स्वाध्याय करे और ब्राह्मणोंका सत्कार करे ॥ २० ॥
महामना भवेद् धर्मे विवहेच्च महाकुले । ब्राह्मणांश्चापि सेवेत क्षमायुक्तान् मनस्विनः ॥ २१ ॥ धर्माचरणमें विशेष मन लगावे। उत्तम कुलमें विवाह करे। उदार एवं क्षमाशील ब्राह्मणोंकी सेवामें रहे ॥
जपेदुदकशीलः स्यात् सततं सुखमास्थितः । धर्मान्वितान् सम्प्रविशेद् बहिः कृत्वेह दुष्कृतीन् ॥ २२ ॥ वह जलमें खड़ा होकर गायत्रीका जप करे। सदा प्रसन्न रहे। पापियोंको राज्यसे बाहर निकालकर धर्मात्मा पुरुषोंका संग करे ॥ २२ ॥
प्रसादयेन्मधुरया वाचा वाप्यथ कर्मणा । तवास्मीति वदेन्नित्यं परेषां कीर्तयन् गुणान् ॥ २३ ॥ मीठी वाणी तथा उत्तम कर्मके द्वारा सबको प्रसन्न रखे, दूसरोंके गुणोंका बखान करे और सबसे यही कहे—मैं आपका ही हूँ—आप मुझे अपना ही समझें ॥ २३ ॥
अपापो ह्येवमाचारः क्षिप्रं बहुमतो भवेत् । पापान्यपि हि कृच्छ्राणि शमयेन्नात्र संशयः ॥ २४ ॥ जो राजा इस प्रकार अपना आचरण बना लेता है, वह शीघ्र ही निष्पाप होकर सबके सम्मानका पात्र बन जाता है। वह अपने कठिन-से-कठिन पापोंको भी शान्त (नष्ट) कर देता है—इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥
गुरवो हि परं धर्मं यं ब्रूयुस्तं तथा कुरु । गुरूणां हि प्रसादाद् वै श्रेयः परमवाप्स्यसि ॥ २५ ॥ राजन्! गुरुजन तुम्हारे लिये जिस उत्तम धर्मका उपदेश करें, उसका उसी रूपमें पालन करो। गुरुजनोंकी कृपासे तुम परम कल्याणके भागी होओगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि कामन्दकाङ्गिरिषसंवादे त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२३ ॥