महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 825, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंततोऽपरो महाराज प्रज्वलन्निव तेजसा ।। ५१ ।। शरीरान्निःसृतस्तस्य प्रह्लादस्य महात्मनः । महाराज! तदनन्तर महात्मा प्रह्लादके शरीरसे एक तीसरा पुरुष प्रकट हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था ।। ५१ १/२ ।।
को भवानिति पृष्टश्च तमाह स महाद्युतिः ।। ५२ ।। सत्यं विद्ध्यसुरेन्द्राद्य प्रयास्ये धर्ममन्वहम् । 'आप कौन हैं?' यह प्रश्न होनेपर उस महातेजस्वीने उन्हें उत्तर दिया—'असुरेन्द्र! मुझे सत्य समझो! मैं अब धर्मके पीछे-पीछे जाऊँगा' ।। ५२ १/२ ।।
तस्मिन्ननुगते सत्ये महान् वै पुरुषोऽपरः ।। ५३ ।। निष्चक्राम ततस्तस्मात् पृष्टश्चाह महाबलः । वृत्तं प्रह्लाद मां विद्धि यतः सत्यं ततो ह्यहम् ।। ५४ ।। सत्यके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे दूसरा महापुरुष प्रकट हुआ। परिचय पूछनेपर उस महाबलीने उत्तर दिया—प्रह्लाद! मुझे सदाचार समझो। जहाँ सत्य होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ ।। ५३-५४ ।।
तस्मिन् गते महाशब्दः शरीरात् तस्य निर्ययौ । पृष्टश्चाह बलं विद्धि यतो वृत्तमहं ततः ।। ५५ ।। उसके चले जानेपर प्रह्लादके शरीरसे महान् शब्द करता हुआ पुनः एक पुरुष प्रकट हुआ। उसने पूछनेपर बताया—'मुझे बल समझो। जहाँ सदाचार होता है, वहीं मेरा भी स्थान है' ।। ५५ ।।
इत्युक्त्वा प्रययौ तत्र यतो वृत्तं नराधिप । ततः प्रभामयी देवी शरीरात् तस्य निर्ययौ ।। ५६ ।। तामपृच्छत् स दैत्येन्द्रः सा श्रीरित्येनमब्रवीत् । उषितास्मि स्वयं वीर त्वयि सत्यपराक्रम ।। ५७ ।। त्वया त्यक्ता गमिष्यामि बलं ह्यनुगता ह्यहम् । नरेश्वर! ऐसा कहकर बल सदाचारके पीछे चला गया। तत्पश्चात् प्रह्लादके शरीरसे एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई। दैत्यराजने उससे पूछा—'आप कौन हैं?' वह बोली—'मैं लक्ष्मी हूँ। सत्यपराक्रमी वीर! मैं स्वयं ही आकर तुम्हारे शरीरमें निवास करती थी, परंतु अब तुमने मुझे त्याग दिया; इसलिये चली जाऊँगी; क्योंकि मैं बलकी अनुगामिनी हूँ' ।। ५६-५७ १/२ ।।
ततो भयं प्रादुरासीत् प्रह्लादस्य महात्मनः ।। ५८ ।। अपृच्छत् स ततो भूयः क्व यासि कमलालये । त्वं हि सत्यव्रता देवी लोकस्य परमेश्वरी । कश्चासौ ब्राह्मणश्रेष्ठस्तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।। ५९ ।।