महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 827, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यान देकर सुनो ।। ६५ ।।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा ।
अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत् प्रशस्यते ।। ६६ ।।
मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीसे द्रोह न करना, सबपर दया करना और यथाशक्ति दान देना—यह शील कहलाता है, जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं ।। ६६ ।।
यदन्येषां हितं न स्यादात्मनः कर्म पौरुषम् ।
अपत्रपेत वा येन न तत् कुर्यात् कथंचन ।। ६७ ।।
अपना जो भी पुरुषार्थ और कर्म दूसरोंके लिये हितकर न हो अथवा जिसे करनेमें संकोचका अनुभव होता हो, उसे किसी तरह नहीं करना चाहिये ।। ६७ ।।
तत्तु कर्म तथा कुर्याद् येन श्लाघ्येत संसदि ।
शीलं समासेनेतत् ते कथितं कुरुसत्तम ।। ६८ ।।
जो कर्म जिस प्रकार करनेसे भरी सभामें मनुष्यकी प्रशंसा हो, उसे उसी प्रकार करना चाहिये। कुरुश्रेष्ठ! यह तुम्हें थोड़ेमें शीलका स्वरूप बताया गया है ।। ६८ ।।
यद्यप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं क्वचित् ।
न भुञ्जते चिरं तात समूलाश्च न सन्ति ते ।। ६९ ।।
तात! नरेश्वर! यद्यपि कहीं-कहीं शीलहीन मनुष्य भी राजलक्ष्मीको प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकालतक उसका उपभोग नहीं कर पाते और जड़मूलसहित नष्ट हो जाते हैं ।। ६९ ।।
एतद् विदित्वा तत्त्वेन शीलवान् भव पुत्रक ।
यदिच्छसि श्रियं तात सुविशिष्टां युधिष्ठिरात् ।। ७० ।।
बेटा! यदि तुम युधिष्ठिरसे भी अच्छी सम्पत्ति प्राप्त करना चाहो तो इस उपदेशको यथार्थरूपसे समझकर शीलवान् बनो ।। ७० ।।
भीष्म उवाच
एतत् कथितवान् पुत्रे धृतराष्ट्रो नराधिपः ।
एतत् कुरुष्व कौन्तेय ततः प्राप्स्यसि तत् फलम् ।। ७१ ।।
भीष्मजी कहते हैं— कुन्तीनन्दन! राजा धृतराष्ट्रने अपने पुत्रको यह उपदेश दिया था। तुम भी इसका आचरण करो, इससे तुम्हें भी वही फल प्राप्त होगा ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि शीलवर्णनं नाम चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १२४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें शीलवर्णनविषयक एक सौ चौबीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२४ ।।