महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 832, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
राजा सुमित्रका मृगकी खोज करते हुए तपस्वी मुनियोंके आश्रमपर पहुँचना और उनसे आशाके विषयमें प्रश्न करना
भीष्म उवाच
प्रविश्य स महारण्यं तापसानामथाश्रमम् ।
आससाद ततो राजा श्रान्तश्चोपाविशत् तदा ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! उस महान् वनमें प्रवेश करके राजा सुमित्र तापसोंके आश्रमपर जा पहुँचे और वहाँ थककर बैठ गये ॥ १ ॥
तं कार्मुकधरं दृष्ट्वा श्रमार्तं क्षुधितं तदा ।
समेत्य ऋषयस्तस्मिन् पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥ २ ॥
वे परिश्रमसे पीड़ित और भूखसे व्याकुल हो रहे थे। उस अवस्थामें धनुष धारण किये राजा सुमित्रको देखकर बहुत-से ऋषि उनके पास आये और सबने मिलकर उनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ॥ २ ॥
स पूजामृषिभिर्दत्तां सम्प्रगृह्य नराधिपः ।
अपृच्छत् तापसान् सर्वांस्तपसो वृद्धिमुत्तमाम् ॥ ३ ॥
ऋषियोंद्वारा किये गये उस स्वागत-सत्कारको ग्रहण करके राजाने भी उन सब तापसोंसे उनकी तपस्याकी भलीभाँति वृद्धि होनेका समाचार पूछा ॥ ३ ॥
ते तस्य राज्ञो वचनं सम्प्रगृह्य तपोधनाः ।
ऋषयो राजशार्दूलं तमपृच्छन् प्रयोजनम् ॥ ४ ॥
उन तपस्याके धनी महर्षियोंने राजाके वचनोंको सादर ग्रहण करके उन नृपश्रेष्ठके वहाँ आनेका प्रयोजन पूछा ॥ ४ ॥
केन भद्र सुखार्थेन सम्प्राप्तोऽसि तपोवनम् ।
पदातिर्बद्धनिस्त्रिंशो धन्वी बाणी नरेश्वर ॥ ५ ॥
‘कल्याणस्वरूप नरेश्वर! किस सुखके लिये आप इस तपोवनमें तलवार बाँधे धनुष और बाण लिये पैदल ही चले आये हैं? ॥ ५ ॥
एतदिच्छामहे श्रोतुं कुतः प्राप्तोऽसि मानद ।
कस्मिन् कुले तु जातस्त्वं किंनामा चासि ब्रूहि नः ॥ ६ ॥
‘मानद! हम यह सब सुनना चाहते हैं, आप कहाँसे पधारे हैं? किस कुलमें आपका जन्म हुआ है? तथा आपका नाम क्या है? ये सारी बातें हमें बताइये’ ॥
ततः स राजा सर्वेभ्यो द्विजेभ्यः पुरुषर्षभ ।