भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 834, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 834

भवन्तः सुमहाभागास्तस्मात् पृच्छामि संशयम् । आशावान् पुरुषो यः स्यादन्तरिक्षमथापि वा ॥ १५ ॥ किं नु ज्यायस्तरं लोके महत्त्वात् प्रतिभाति वः । एतदिच्छामि तत्त्वेन श्रोतुं किमिह दुर्लभम् ॥ १६ ॥ ‘आप महान् सौभाग्यशाली तपस्वी हैं; इसलिये मैं आपसे अपने मनका संदेह पूछता हूँ। एक ओर आशावान् पुरुष हो और दूसरी ओर अनन्त आकाश हो तो जगत्‌में महत्ताकी दृष्टिसे आपलोगोंको कौन बड़ा जान पड़ता है? मैं इस बातको तत्त्वसे सुनना चाहता हूँ। भला, यहाँ आकर कौन-सी वस्तु दुर्लभ रहेगी? ॥ १५-१६ ॥

यदि गुह्यं न वो नित्यं तदा प्रब्रूत मा चिरम् । न गुह्यं श्रोतुमिच्छामि युष्मद्भ्यो द्विजसत्तमाः ॥ १७ ॥ ‘यदि आपके लिये सदा यह कोई गोपनीय रहस्य न हो तो शीघ्र इसका वर्णन कीजिये। विप्रवरों! मैं आपलोगोंसे ऐसी कोई बात नहीं सुनना चाहता, जो गोपनीय रहस्य हो ॥ १७ ॥

भवत् तपोविघातो वा यदि स्याद् विरमे ततः । यदि वास्ति कथायोगो योऽयं प्रश्नो मयेरितः ॥ १८ ॥ एतत् कारणसामर्थ्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । भवन्तोऽपि तपोनित्या ब्रूयुरेतत् समन्विताः ॥ १९ ॥ ‘यदि मेरे इस प्रश्नसे आपलोगोंकी तपस्यामें विघ्न पड़ रहा हो तो मैं इससे विराम लेता हूँ और यदि आपके पास बातचीतका समय हो तो जो प्रश्न मैंने उपस्थित किया है, इसका आप समाधान करें। मैं इस आशाके कारण और सामर्थ्यके विषयमें ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ। आपलोग भी सदा तपमें संलग्न रहनेवाले हैं; अतः एकत्र होकर इस प्रश्नका विवेचन करें’ ॥ १८-१९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि ऋषभगीतासु षड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें ऋषभगीताविषयक एक सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२६ ॥

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