महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 837, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ उस पुत्रको अवश्य देखूँगा। यहाँ वह निश्चय ही दिखायी देगा। इसी आशासे बँधे हुए पृथ्वीपति राजा वीरद्युम्न उन दिनों उस वनमें विचर रहे थे ॥ १५ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुं नूनं परमधार्मिकः ।
एकः पुत्रो महारण्ये नष्ट इत्यसकृत् तदा ॥ १६ ॥
‘वह बड़ा धर्मात्मा था। अब उसका दर्शन होना अवश्य ही मेरे लिये दुर्लभ है। एक ही बेटा था, वह भी इस विशाल वनमें खो गया’ इन्हीं बातोंको वे बार-बार दुहराते थे ॥ १६ ॥
दुर्लभः स मया द्रष्टुमाशा च महती मम ।
तया परीतगात्रोऽहं मुमूर्षुर्नात्र संशयः ॥ १७ ॥
‘मेरे लिये उसका दर्शन दुर्लभ है तो भी मेरे मनमें उसके मिलनेकी बड़ी भारी आशा लगी हुई है। उस आशाने मेरे सम्पूर्ण शरीरपर अधिकार कर लिया है। इसमें संदेह नहीं कि मैं उसके लिये मौतको भी स्वीकार कर लेना चाहता हूँ’ ॥ १७ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु भगवांस्तनुर्मुनिवरोत्तमः ।
अवाक्शिरा ध्यानपरो मुहूर्तमिव तस्थिवान् ॥ १८ ॥
राजाकी यह बात सुनकर मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् तनु नीचे सिर किये ध्यानमग्न हो दो घड़ीतक चुपचाप बैठे रह गये ॥ १८ ॥
तमनुध्यान्तमालक्ष्य राजा परमदुर्मनाः ।
उवाच वाक्यं दीनात्मा मन्दं मन्दमिवासकृत् ॥ १९ ॥
उनको चिन्तन करते देख परम दुखी हुए नरेश दीनहृदय हो मन्द-मन्द वाणीमें बारंबार इस प्रकार कहने लगे— ॥ १९ ॥
दुर्लभं किं नु देवर्षे आशायाश्चैव किं महत् ।
ब्रवीतु भगवानेतद् यदि गुह्यं न ते मयि ॥ २० ॥
‘देवर्षे! कौन वस्तु दुर्लभ है? और आशासे भी बड़ा क्या है? यदि आपकी दृष्टिमें यह बात मुझसे छिपानेयोग्य न हो तो आप इसे अवश्य बतावें’ ॥ २० ॥
मुनिरुवाच
महर्षिर्भगवान्स्तेन पूर्वमासीद् विमानितः ।
बालिशां बुद्धिमास्थाय मन्दभाग्यतयाऽऽत्मनः ॥ २१ ॥
**तब मुनिने कहा—**राजन्! आपके उस पुत्रने पहले कभी मूढ़ बुद्धिका आश्रय लेकर अपने दुर्भाग्यके कारण एक पूजनीय महर्षिका अपमान कर दिया था ॥
अर्थयन् कलशं राजन् काञ्चनं वल्कलानि च ।
अवज्ञापूर्वकेनापि न सम्पादितवांस्ततः ।
निर्विण्णः स तु विप्रर्षिर्निशश्वसः समपद्यत ॥ २२ ॥