भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 840, कुल 2450 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 840

पुनः प्रश्न किया ॥ ६ ॥

राजोवाच

आशायाः किं कृशत्वं च किं चेह भुवि दुर्लभम् ।
ब्रवीतु भगवानेतत् त्वं हि धर्मार्थदर्शिवान् ॥ ७ ॥
**राजा बोले—**विप्रवर! आप धर्म और अर्थके ज्ञाता हैं, अतः यह बतानेकी कृपा करें कि आशासे बढ़कर दुर्बलता क्या है? और इस पृथ्वीपर सबसे दुर्लभ क्या है? ॥ ७ ॥
ततः संस्मृत्य तत् सर्वं स्मारयिष्यन्निवाब्रवीत् ।
राजानं भगवान् विप्रस्ततः कृशतनुस्तदा ॥ ८ ॥
तब उन दुर्बल शरीरवाले पूज्यपाद ऋषिने पहलेकी सारी बातोंको याद करके राजाको भी उनका स्मरण दिलाते हुए-से इस प्रकार कहा ॥ ८ ॥

ऋषिरुवाच

कृशत्वेन समं राजन्नाशाया विद्यते नृप ।
तस्या वै दुर्लभत्वाच्च प्रार्थिताः पार्थिवा मया ॥ ९ ॥
**ऋषि बोले—**नरेश्वर! आशा या आशावान्‌की दुर्बलताके समान और किसीकी दुर्बलता नहीं है। जिस वस्तुकी आशा की जाती है, उसकी दुर्लभताके कारण ही मैंने बहुत-से राजाओंके यहाँ याचना की है ॥ ९ ॥

राजोवाच

कृशाकृशे मया ब्रह्मन् गृहीते वचनात् तव ।
दुर्लभत्वं च तस्यैव वेदवाक्यमिव द्विज ॥ १० ॥
**राजाने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने आपके कहनेसे यह अच्छी तरह समझ लिया कि जो आशासे बँधा हुआ है, वह दुर्बल है और जिसने आशाको जीत लिया है, वह पुष्ट है। द्विजश्रेष्ठ! आपकी इस बातको भी मैंने वेदवाक्यकी भाँति ग्रहण किया कि जिस वस्तुकी आशा की जाती है, वह अत्यन्त दुर्लभ होती है ॥ १० ॥
संशयस्तु महाप्राज्ञ संजातो हृदये मम ।
तन्मुने मम तत्त्वेन वक्तुमर्हसि पृच्छतः ॥ ११ ॥
महाप्राज्ञ! मुने! किंतु मेरे मनमें एक संशय है, जिसे पूछ रहा हूँ। आप उसे यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें ॥ ११ ॥
त्वत्तः कृशतरं किं नु ब्रवीतु भगवानिदम् ।
यदि गुह्यं न ते किञ्चिद् विद्यते मुनिसत्तम ॥ १२ ॥
मुनिश्रेष्ठ! यदि कोई वस्तु आपके लिये गोपनीय या छिपानेयोग्य न हो तो आप यह बतावें कि आपसे भी बढ़कर अत्यन्त दुर्बल वस्तु क्या है? ॥ १२ ॥