भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 842, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 842

संस्पृश्य पादौ शिरसा निपपात द्विजर्षभम् ॥ १९ ॥ राजन्! ब्राह्मणश्रेष्ठ उस ऋषिकी वह बात सुनकर राजा अपनी रानीके साथ उनके चरणोंका मस्तकसे स्पर्श करके वहीं गिर पड़े ॥ १९ ॥

राजोवाच

प्रसादये त्वां भगवन् पुत्रेणेच्छामि संगमम् । यदेतदुक्तं भवता सम्प्रति द्विजसत्तम ॥ २० ॥ सत्यमेतन्न संदेहो यदेतद् व्याहृतं त्वया । **राजा बोले—**भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। मुझे अपने पुत्रसे मिलनेकी बड़ी इच्छा है। द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझसे इस समय जो कुछ कहा है, आपका यह सारा कथन सत्य है, इसमें संदेह नहीं ॥

ततः प्रहस्य भगवांस्तनुर्धर्मभृतां वरः ॥ २१ ॥ पुत्रमस्या नयत् क्षिप्रं तपसा च श्रुतेन च । तब धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ भगवान् तनुने हँसकर अपनी तपस्या और शास्त्रज्ञानके प्रभावसे राजकुमारको शीघ्र वहाँ बुला दिया ॥ २१ १/२ ॥

स समानीय तत्पुत्रं तमुपालभ्य पार्थिवम् ॥ २२ ॥ आत्मानं दर्शयामास धर्मं धर्मभृतां वरः । इस प्रकार उनके पुत्रको वहाँ बुलाकर तथा राजाको उलाहना देकर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ तनु मुनिने उन्हें अपने साक्षात् धर्मस्वरूपका दर्शन कराया ॥ २२ १/२ ॥

स दर्शयित्वा चात्मानं दिव्यमद्भुतदर्शनम् । विपाप्मा विगतक्रोधश्चचार वनमन्तिकात् ॥ २३ ॥ दिव्य और अद्भुत दिखायी देनेवाले अपने स्वरूपका उन्हें दर्शन कराकर क्रोध और पापसे रहित तनु मुनि निकटवर्ती वनमें चले गये ॥ २३ ॥

एतद् दृष्टं मया राजंस्तथा च वचनं श्रुतम् । आशामपनयस्वाशु ततः कृशतरीमिमाम् ॥ २४ ॥ ऋषभ मुनि कहते हैं—राजन्! मैंने यह सब कुछ अपनी आँखों देखा है और मुनिका वह कथन भी अपने कानों सुना है। ऐसे ही तुम भी शरीरको अत्यन्त कृश बना देनेवाली इस मृगविषयक दुराशाको शीघ्र ही त्याग दो ॥ २४ ॥

भीष्म उवाच

स तथोक्तस्तदा राजन् ऋषभेण महात्मना । सुमित्रोऽपनयत् क्षिप्रामाशां कृशतरीं ततः ॥ २५ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! महात्मा ऋषभके ऐसा कहनेपर सुमित्रने शरीरको अत्यन्त दुर्बल बनानेवाली वह आशा तुरंत ही त्याग दी ॥ २५ ॥