भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

यम और गौतमका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

नामृतस्येव पर्याप्तिर्ममास्ति ब्रुवति त्वयि ।
यथा हि स्वात्मवृत्तिस्थस्तथा तृप्तोऽस्मि भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— भरतनन्दन! जैसे अमृतको पीनेसे इच्छा पूर्ण नहीं होती, और भी पीनेकी इच्छा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार जब आप उपदेश करने लगते हैं, उस समय उसे सुननेसे मेरा मन नहीं भरता है। जैसे परमात्माके ध्यानमें निमग्न हुआ योगी परमानन्दसे तृप्त हो जाता है, उसी प्रकार मैं भी अत्यन्त तृप्तिका अनुभव करता हूँ ॥ १ ॥

तस्मात् कथय भूयस्त्वं धर्ममेव पितामह ।
न हि तृप्तिमहं यामि पिबन् धर्मामृतं हि ते ॥ २ ॥
अतः पितामह! आप पुनः धर्मकी ही बात बताइये। आपके धर्मोपदेशरूपी अमृतका पान करते समय मुझे यह नहीं अनुभव होता है कि बस, अब पूरा हो गया, बल्कि सुननेकी प्यास और बढ़ती ही जाती है ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
गौतमस्य च संवादं यमस्य च महात्मनः ॥ ३ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस धर्मके विषयमें भी विज्ञ पुरुष गौतम तथा महात्मा यमके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ३ ॥

पारियात्रं गिरिं प्राप्य गौतमस्याश्रमो महान् ।
उवास गौतमो यं च कालं तमपि मे शृणु ॥ ४ ॥
पारियात्रनामक पर्वतपर महर्षि गौतमका महान् आश्रम है। उसमें गौतम जितने समयतक रहे, वह भी मुझसे सुनो ॥ ४ ॥

षष्टिं वर्षसहस्राणि सोऽतप्यद् गौतमस्तपः ।
तमुग्रतपसा युक्तं भावितं सुमहामुनिम् ॥ ५ ॥
उपयातो नरव्याघ्र लोकपालो यमस्तदा ।
तमपश्यत् सुतपसमृषिं वै गौतमं तदा ॥ ६ ॥
गौतमने उस आश्रममें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की। नरश्रेष्ठ! एक दिन उग्र तपस्यामें लगे हुए पवित्र महात्मा महामुनि गौतमके पास लोकपाल यम स्वयं आये। उन्होंने वहाँ आकर उत्तम तपस्वी गौतम ऋषिको देखा ॥ ५-६ ॥