महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 858, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानबलपूतो यो वर्तते निन्दितेष्वपि । वृत्तिविज्ञानवान् धीरः कस्तं वा वक्तुमर्हति ॥ ६ ॥ जो तत्त्वज्ञानके प्रभावसे पवित्र है और किस वृत्तिसे किसका निर्वाह हो सकता है, इस बातको अच्छी तरह समझता है, वह धीर नरेश यदि राज्यको संकटसे बचानेके लिये निन्दित कर्मोंमें भी प्रवृत्त होता है तो कौन उसकी निन्दा कर सकता है? ॥ ६ ॥ येषां बलकृता वृत्तिस्तेषामन्या न रोचते । तेजसाभिप्रवर्तन्ते बलवन्तो युधिष्ठिर ॥ ७ ॥ युधिष्ठिर! जो बल और पराक्रमसे ही जीविका चलानेवाले हैं, उन्हें दूसरी वृत्ति अच्छी नहीं लगती। बलवान् पुरुष अपने तेजसे ही कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ ७ ॥ यदैव प्राकृतं शास्त्रमविशेषेण वर्तते । तदैवमभ्यसेदेवं मेधावी वाप्यथोत्तरम् ॥ ८ ॥ जब आपद्धर्मोपयोगी प्राकृत शास्त्र ही सामान्यरूपसे चल रहा हो, उस आपत्तिकालमें 'अपने या दूसरेके राज्यसे जैसे भी सम्भव हो, धन लेकर अपना खजाना भरना चाहिये' इत्यादि वचनोंके अनुसार राजा जीवन-निर्वाह करे। परंतु जो मेधावी हो, वह इससे भी आगे बढ़कर 'जो दो राज्योंमें रहनेवाले धनीलोग कंजूसी अथवा असदाचरणके द्वारा दण्ड पानेयोग्य हों, उनसे ही धन लेना चाहिये।' इत्यादि विशेष शास्त्रोंका अवलम्बन करे ॥ ८ ॥ ऋत्विक्पुरोहिताचार्यान् सत्कृतानभिसत्कृतान् । न ब्राह्मणान् घातयीत दोषान् प्राप्नोति घातयन् ॥ ९ ॥ कितनी ही आपत्ति क्यों न हो, ऋत्विक्, पुरोहित, आचार्य तथा सत्कृत या असत्कृत ब्राह्मणोंसे, वे धनी हों तो भी धन लेकर उन्हें पीड़ा न दे। यदि राजा उन्हें धनापहरणके द्वारा कष्ट देता है तो पापका भागी होता है ॥ ९ ॥ एतत् प्रमाणं लोकस्य चक्षुरेतत् सनातनम् । तत् प्रमाणोऽवगाहेत तेन तत् साध्वसाधु वा ॥ १० ॥ यह मैंने तुम्हें सब लोगोंके लिये प्रमाणभूत बात बतायी है। यही सनातन दृष्टि है। राजा इसीको प्रमाण मानकर व्यवहारक्षेत्रमें प्रवेश करे तथा इसीके अनुसार आपत्तिकालमें उसे भले या बुरे कार्यका निर्णय करना चाहिये ॥ १० ॥ बहवो ग्रामवास्तव्या रोषाद् ब्रूयुः परस्परम् । न तेषां वचनाद् राजा सत्कुर्याद् घातयीत वा ॥ ११ ॥ यदि बहुत-से ग्रामवासी मनुष्य परस्पर रोषवश राजाके पास आकर एक-दूसरेकी निन्दा-स्तुति करें तो राजा केवल उनके कहनेसे ही किसीको न तो दण्ड