महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 866, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं धर्मसे भी बलको ही अधिक श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि बलसे धर्मकी प्रवृत्ति होती है। जैसे चलने-फिरनेवाले सभी प्राणी पृथ्वीपर ही स्थित हैं, उसी प्रकार धर्म बलपर ही प्रतिष्ठित है ॥ ६ ॥ धूमो वायोरिव वशे बलं धर्मोऽनुवर्तते । अनीश्वरो बले धर्मो द्रुमे वल्लीव संश्रिता ॥ ७ ॥ जैसे धूआँ वायुके अधीन होकर चलता है, उसी प्रकार धर्म भी बलका अनुसरण करता है; अतः जैसे लता किसी वृक्षके सहारे फैलती है, उसी प्रकार निर्बल धर्मबलके ही आधारपर सदा स्थिर रहता है ॥ ७ ॥ वशे बलवतां धर्मः सुखं भोगवतामिव । नास्त्यसाध्यं बलवतां सर्वं बलवतां शुचि ॥ ८ ॥ जैसे भोग-सामग्रीसे सम्पन्न पुरुषोंके अधीन सुख-भोग होता है, उसी प्रकार धर्म बलवानोंके वशमें रहता है। बलवानोंके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। बलवानोंकी सारी वस्तु ही शुद्ध एवं निर्दोष होती है ॥ ८ ॥ दुराचारः क्षीणबलः परित्राणं न गच्छति । अथ तस्मादुद्विजते सर्वो लोको वृकादिव ॥ ९ ॥ जिसका बल नष्ट हो गया है, जो दुराचारी है, उसको भय उपस्थित होनेपर कोई रक्षक नहीं मिलता है। दुर्बलसे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न हो उठते हैं, जैसे भेड़ियेसे ॥ ९ ॥ अपध्वस्तो ह्यवमतो दुःखं जीवति जीवितम् । जीवितं यदपकृष्टं यथैव मरणं तथा ॥ १० ॥ दुर्बल अपनी सम्पत्तिसे वंचित हो जाता है, सबके अपमान और उपेक्षाका पात्र बनता है तथा दुःखमय जीवन व्यतीत करता है। जो जीवन निन्दित हो जाता है, वह मृत्युके ही तुल्य है ॥ १० ॥ यदेवमाहुः पापेन चारित्रेण विवर्जितः । सुभृशं तप्यते तेन वाक्शल्येन परिक्षतः ॥ ११ ॥ दुर्बल मनुष्यके विषयमें लोग इस प्रकार कहने लगते हैं—'अरे! यह तो अपने पापाचारके कारण बन्धु-बान्धवोंद्वारा त्याग दिया गया है।' उनके उस वाग्बाणसे घायल होकर वह अत्यन्त संतप्त हो उठता है ॥ ११ ॥ अत्रैतदाहुराचार्याः पापस्य परिमोक्षणे । त्रयीं विद्यामवेक्षेत तथोपासीत वै द्विजान् ॥ १२ ॥ प्रसादयेन्मधुरया वाचा चाप्यथ कर्मणा । महामनाश्चापि भवेद् विवहेच्च महाकुले ॥ १३ ॥ इत्यस्मीति वदेदेवं परेषां कीर्तयेद् गुणान् । जपेदुदकशीलः स्यात् पेशलो नातिजल्पकः ॥ १४ ॥