महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 871, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदैव तेऽनुमार्यन्ते कुणपे कृमयो यथा ॥ २१ ॥
जो लोग राष्ट्रको हानि पहुँचाकर अपनी उन्नतिका लिये प्रयत्न करते हैं, वे मुर्दोंमें पड़े हुए कीड़ोंके समान उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं ॥ २१ ॥
ये पुनर्धर्मशास्त्रेण वर्तेरन्निह दस्यवः ।
अपि ते दस्यवो भूत्वा क्षिप्रं सिद्धिमवाप्नुयुः ॥ २२ ॥
जो दस्युजातिमें उत्पन्न होकर भी धर्मशास्त्रके अनुसार आचरण करते हैं, वे लुटेरे होनेपर भी शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं (ये सब बातें तुम्हें स्वीकार हों तो मैं तुम्हारा सरदार बन सकता हूँ) ॥ २२ ॥
भीष्म उवाच
ते सर्वमेवानुचक्रुः कायव्यस्यानुशासनम् ।
वृद्धिं च लेभिरे सर्वे पापेभ्यश्चाप्युपारमन् ॥ २३ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! यह सुनकर उन दस्युओंने कायव्यकी सारी आज्ञा मान ली और सदा उसका अनुसरण किया। इससे उन सभीकी उन्नति हुई और वे पाप-कर्मोंसे हट गये ॥ २३ ॥
कायव्यः कर्मणा तेन महतीं सिद्धिमाप्तवान् ।
साधूनामाचरन् क्षेमं दस्यून् पापान्निवर्तयम् ॥ २४ ॥
कायव्यने उस पुण्यकर्मसे बड़ी भारी सिद्धि प्राप्त कर ली; क्योंकि उसने साधु पुरुषोंका कल्याण करते हुए डाकुओंको पापसे बचा लिया था ॥ २४ ॥
इदं कायव्यचरितं यो नित्यमनुचिन्तयेत् ।
नारण्येभ्यो हि भूतेभ्यो भयं प्राप्नोति किंचन ॥ २५ ॥
जो प्रतिदिन कायव्यके इस चरित्रका चिन्तन करता है, उसे वनवासी प्राणियोंसे किंचिन्मात्र भी भय नहीं प्राप्त होता ॥ २५ ॥
न भयं तस्य भूतेभ्यः सर्वेभ्यश्चैव भारत ।
नासतो विद्यते राजन् स ह्यारण्येषु गोपतिः ॥ २६ ॥
भारत! उसे सम्पूर्ण भूतोंसे भी भय नहीं होता। राजन्! किसी दुष्टात्मासे भी उसको डर नहीं लगता। वह तो वनका अधिपति हो जाता है ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कायव्यचरिते
पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कायव्यका चरित्रविषयक एक सौ पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥