महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंविभज्य गुरोश्चर्यां तद् वै दुष्करमुच्यते ॥ १९ ॥ हवन-कर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायद्वारा ब्रह्मर्षियोंको तथा श्राद्धद्वारा सनातन पितरोंको उनका भाग समर्पित करके गुरुकी परिचर्या करना दुष्कर व्रत कहलाता है ॥ १९ ॥
देवा वै दुष्करं कृत्वा विभूतिं परमां गताः । तस्माद् गार्हस्थ्यमुद्वोढुं दुष्करं प्रब्रवीमि वः ॥ २० ॥ इस दुष्कर व्रतका अनुष्ठान करके देवताओंने उत्तम वैभव प्राप्त किया है। यह गृहस्थधर्मका पालन ही दुष्कर व्रत है। मैं तुमलोगोंसे इसी दुष्कर व्रतका भार उठानेके लिये कह रहा हूँ ॥ २० ॥
तपः श्रेष्ठं प्रजानां हि मूलमेतन्न संशयः । कुटुम्बविधिनानेन यस्मिन् सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ २१ ॥ तपस्या श्रेष्ठ कर्म है। इसमें संदेह नहीं कि यही प्रजावर्गका मूल कारण है। परंतु गार्हस्थ्यविधायक शास्त्रके अनुसार इस गार्हस्थ्य-धर्ममें ही सारी तपस्या प्रतिष्ठित है ॥ २१ ॥
एतद् विदुस्तपो विप्रा द्वन्द्वातीता विमत्सराः । तस्माद् व्रतं मध्यमं तु लोकेषु तप उच्यते ॥ २२ ॥ जिनके मनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं है, जो सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे रहित हैं, वे ब्राह्मण इसीको तप मानते हैं। यद्यपि लोकमें व्रतको भी तप कहा जाता है, किंतु वह पंचयज्ञके अनुष्ठानकी अपेक्षा मध्यम श्रेणीका है ॥ २२ ॥
दुराधर्षं पदं चैव गच्छन्ति विघसाशिनः । सायंप्रातर्विभज्यान्नं स्वकुटुम्बे यथाविधि ॥ २३ ॥ दत्त्वातिथिभ्यो देवेभ्यः पितृभ्यः स्वजनाय च । अवशिष्टानि येऽश्नन्ति तानाहुर्विघसाशिनः ॥ २४ ॥