महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 884, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरूँ ॥ ४४ ॥ कदाचिद् व्यसनं प्राप्य संधिं कुर्यान्मया सह । बलिना संनिकृष्टस्य शत्रोरपि परिग्रहः ॥ ४५ ॥ कार्य इत्याहुराचार्या विषमे जीवितार्थिना । ‘हो सकता है कि विपत्तिमें पड़ा होनेके कारण यह मेरे साथ संधि कर ले। आचार्योंका कथन है कि संकट आ पड़नेपर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले बलवान् पुरुषको भी अपने निकटवर्ती शत्रुसे मेल कर लेना चाहिये ॥ ४५ १/२ ॥ श्रेष्ठो हि पण्डितः शत्रुर्न च मित्रमपण्डितः ॥ ४६ ॥ मम त्वमित्रे माजरि जीवितं सम्प्रतिष्ठितम् । ‘विद्वान् शत्रु भी अच्छा होता है किंतु मूर्ख मित्र भी अच्छा नहीं है। मेरा जीवन तो आज मेरे शत्रु बिलावके ही अधीन है ॥ ४६ १/२ ॥ हन्तास्मै सम्प्रवक्ष्यामि हेतुमात्माभिरक्षणे ॥ ४७ ॥ अपीदानीमयं शत्रुः सङ्गत्या पण्डितो भवेत् । ‘अच्छा, अब मैं इसे आत्मरक्षाके लिये एक युक्ति बता रहा हूँ। सम्भव है, यह शत्रु इस समय मेरी संगतिसे विद्वान् हो जाय—विवेकसे काम ले’ ॥ ४७ १/२ ॥ एवं विचिन्तयामास मूषिकः शत्रुचेष्टितम् ॥ ४८ ॥ ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः संधिविग्रहकालवित् । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यं मार्जारं मूषिकोऽब्रवीत् ॥ ४९ ॥ इस प्रकार चूहेने शत्रुकी चेष्टापर विचार किया। वह अर्थसिद्धिके उपायको यथार्थरूपसे जाननेवाला तथा संधि और विग्रहके अवसरको समझनेवाला था। उसने बिलावको सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें कहा— ॥ ४८-४९ ॥ सौहृदेनाभिभाषे त्वां कच्चिन्मार्जार जीवसि । जीवितं हि तवेच्छामि श्रेयः साधारणं हि नौ ॥ ५० ॥ ‘भैया बिलाव! मैं तुम्हारे प्रति मैत्रीका भाव रखकर बातचीत कर रहा हूँ। तुम अभी जीवित तो हो न? मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सुरक्षित रहे; क्योंकि इसमें मेरी और तुम्हारी दोनोंकी एक-सी भलाई है ॥ ५० ॥ न ते सौम्य भयं कार्यं जीविष्यसि यथासुखम् । अहं त्वामुद्धरिष्यामि यदि मां न जिघांससि ॥ ५१ ॥ ‘सौम्य! तुम्हें डरना नहीं चाहिये। तुम आनन्दपूर्वक जीवित रह सकोगे। यदि मुझे मार डालनेकी इच्छा त्याग दो तो मैं इस संकटसे तुम्हारा उद्धार कर दूँगा ॥ ५१ ॥ अस्ति कश्चिदुपायोऽत्र दुष्करः प्रतिभाति मे । येन शक्यस्त्वया मोक्षः प्राप्तुं श्रेयस्तथा मया ॥ ५२ ॥