महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 889, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ें'कोई किसीके उपकारका कितना ही अधिक बदला क्यों न चुका दे; वह प्रथम उपकार करनेवालेके समान नहीं शोभा पाता है; क्योंकि एक तो किसीके उपकार करनेपर बदलेमें उसका उपकार करता है; परंतु दूसरेने बिना किसी कारणके ही उसकी भलाई की है' ।। ८२ ।।
भीष्म उवाच
ग्राहयित्वा तु तं स्वार्थं मार्जारं मूषिकस्तथा ।
प्रविवेश तु विश्रभ्य क्रोडमस्य कृतागसः ।। ८३ ।।
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! इस प्रकार चूहेने बिलावसे अपने मतलबकी बात स्वीकार कराकर और स्वयं भी उसका विश्वास करके उस अपराधी शत्रु की भी गोदमें जा बैठा ।। ८३ ।।
एवमाश्वासितो विद्वान् मार्जारिण स मूषिकः ।
मार्जारोरसि विस्रब्धः सुष्वाप पितृमातृवत् ।। ८४ ।।
बिलावने जब उस विद्वान् चूहेको पूर्वोक्तरूपसे आश्वासन दिया, तब वह माता-पिताकी गोदके समान उस बिलावकी छातीपर निर्भय होकर सो गया ।। ८४ ।।
लीनं तु तस्य गात्रेषु मार्जारस्य च मूषिकम् ।
दृष्ट्वा तौ नकुलोलूकौ निराशौ प्रत्यपद्यताम् ।। ८५ ।।
चूहेको बिलावके अंगोंमें छिपा हुआ देख नेवला और उल्लू दोनों निराश हो गये ।। ८५ ।।
तथैव तौ सुसंत्रस्तौ दृढमागततन्द्रितौ ।
दृष्ट्वा तयोः परां प्रीतिं विस्मयं परमं गतौ ।। ८६ ।।
उन दोनोंको बड़े जोरसे औंघाई आ रही थी और वे अत्यन्त भयभीत भी हो गये थे। उस समय चूहे और बिलावका वह विशेष प्रेम देखकर नेवला और उल्लू दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ ।। ८६ ।।
बलिनौ मतिमन्तौ च सुवृत्तौ चाप्युपासितौ ।
अशक्तौ तु नयात् तस्मात् सम्प्रधर्षयितुं बलात् ।। ८७ ।।
यद्यपि वे बड़े बलवान्, बुद्धिमान्, सुन्दर बर्ताव करनेवाले, कार्यकुशल तथा निकटवर्ती थे तो भी उस संधिकी नीतिसे काम लेनेके कारण उन चूहे और बिलावपर वे बलपूर्वक आक्रमण करनेमें समर्थ न हो सके ।। ८७ ।।
कार्यार्थं कृतसंधी तौ दृष्ट्वा मार्जारमूषिकौ ।
उलूकनकुलौ तूर्णं जग्मतुस्तौ स्वमालयम् ।। ८८ ।।
अपने-अपने प्रयोजनकी सिद्धिके लिये चूहे और बिलावने आपसमें संधि कर ली, यह देखकर उल्लू और नेवला दोनों तत्काल अपने निवासस्थानको लौट गये ।। ८८ ।।