महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 932, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्थी तु शक्यते भोक्तुं कृतकार्योऽवमन्यते । तस्मात् सर्वाणि कार्याणि सावशेषाणि कारयेत् ॥ २० ॥ ‘अनेक प्रकारके प्रयोजन रखनेवाला मनुष्य कृतघ्नके साथ आर्थिक सम्बन्ध न जोड़े, किसीका भी काम पूरा न करे, क्योंकि जो अर्थी (प्रयोजन-सिद्धिकी इच्छावाला) होता है, उससे तो बारंबार काम लिया जा सकता है; परंतु जिसका प्रयोजन सिद्ध हो जाता है, वह अपने उपकारी पुरुषकी उपेक्षा कर देता है; इसलिये दूसरोंके सारे कार्य (जो अपने द्वारा होनेवाले हों) अधूरे ही रखने चाहिये ॥ २० ॥ कोकिलस्य वराहस्य मेरोः शून्यस्य वेश्मनः । नटस्य भक्तिमित्रस्य यच्छ्रेयस्तत् समाचरेत् ॥ २१ ॥ ‘कोयल, सूअर, सुमेरु पर्वत, शून्यगृह, नट तथा अनुरक्त सुहृद्—इनमें जो श्रेष्ठ गुण या विशेषताएँ हैं, उन्हें राजा काममें लावे* ॥ २१ ॥ उत्थायोत्थाय गच्छेत नित्ययुक्तो रिपोर्गृहान् । कुशलं चास्य पृच्छेत यद्यप्यकुशलं भवेत् ॥ २२ ॥ ‘राजाको चाहिये कि वह प्रतिदिन उठ-उठकर पूर्ण सावधान हो शत्रुके घर जाय और उसका अमंगल ही क्यों न हो रहा हो, सदा उसकी कुशल पूछे और मंगल कामना करे ॥ २२ ॥ नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान् न क्लीबा नाभिमानिनः । न च लोकरवाद् भीता न वै शश्वत् प्रतीक्षिणः ॥ २३ ॥ ‘जो आलसी हैं, कायर हैं, अभिमानी हैं, लोक-चर्चासे डरनेवाले और सदा समयकी प्रतीक्षामें बैठे रहनेवाले हैं, ऐसे लोग अपने अभीष्ट अर्थको नहीं पा सकते ॥ २३ ॥ नात्मच्छिद्रं रिपुर्विद्याद् विद्याच्छिद्रं परस्य तु । गूहेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः ॥ २४ ॥ ‘राजा इस तरह सतर्क रहे कि उसके छिद्रका शत्रुको पता न चले, परंतु वह शत्रुके छिद्रको जान ले। जैसे कछुआ अपने सब अंगोंको समेटकर छिपा लेता है, उसी प्रकार राजा अपने छिद्रोंको छिपाये रखे ॥ २४ ॥ बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत् । वृकवच्चावलुम्पेत शरवच्च विनिष्पतेत् ॥ २५ ॥ ‘राजा बगुलेके समान एकाग्रचित्त होकर कर्तव्य-विषयका चिन्तन करे। सिंहके समान पराक्रम प्रकट करे। भेड़ियेकी भाँति सहसा आक्रमण करके शत्रु का धन लूट ले तथा बाणकी भाँति शत्रुओंपर टूट पड़े ॥ २५ ॥ पानमक्षास्तथा नार्यो मृगया गीतवादितम् । एतानि युक्त्या सेवेत प्रसंगो ह्यत्र दोषवान् ॥ २६ ॥