भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

पृष्ठ 935, कुल 2450 में से

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पृष्ठ 935

'अपने तथा शत्रुके राज्यमें ऐसे गुप्तचर नियुक्त करे जिसको कोई जानता-पहचानता न हो। शत्रुके राज्योंमें पाखण्डवेषधारी और तपस्वी आदिको ही गुप्तचर बनाकर भेजना चाहिये ॥ ४० ॥ उद्यानेषु विहारेषु प्रपास्वावसथेषु च । पानागारे प्रवेशेषु तीर्थेषु च सभासु च ॥ ४१ ॥ 'वे गुप्तचर बगीचा, घूमने-फिरनेके स्थान, पौंसला, धर्मशाला, मदबिक्रीके स्थान, नगरके प्रवेशद्वार, तीर्थस्थान और सभाभवन—इन सब स्थलोंमें विचरें ॥ ४१ ॥ धर्माभिचारिणः पापांश्चौरा लोकस्य कण्टकाः । समागच्छन्ति तान् बुद्ध्वा नियच्छेच्छमयीत च ॥ ४२ ॥ 'कपटपूर्ण धर्मका आचरण करनेवाले, पापात्मा, चोर तथा जगत्के लिये कण्टकरूप मनुष्य वहाँ छद्मवेष धारण करके आते रहते हैं, उन सबका पता लगाकर उन्हें कैद कर ले अथवा भय दिखाकर उनकी पापवृत्ति शान्त कर दे ॥ ४२ ॥ न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् । विश्वासाद् भयमभ्येति नापरीक्ष्य च विश्वसेत् ॥ ४३ ॥ 'जो विश्वासपात्र नहीं है, उसपर कभी विश्वास न करे, परंतु जो विश्वासपात्र है, उसपर भी अधिक विश्वास न करे; क्योंकि अधिक विश्वाससे भय उत्पन्न होता है अतः बिना जाँचे-बूझे किसीपर भी विश्वास न करे ॥ विश्वासयित्वा तु परं तत्त्वभूतेन हेतुना । अथास्य प्रहरेत् काले किंचिद् विचलिते पदे ॥ ४४ ॥ 'किसी यथार्थ कारणसे शत्रुके मनमें विश्वास उत्पन्न करके जब कभी उसका पैर लड़खड़ाता देखे अर्थात् उसे कमजोर समझे तभी उसपर प्रहार कर दे ॥ अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात् । भयं ह्यशङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति ॥ ४५ ॥ 'जो संदेह करने योग्य न हो, ऐसे व्यक्तिपर भी संदेह करे—उसकी ओरसे चौकन्ना रहे और जिससे भयकी आशंका हो, उसकी ओरसे तो सदा सब प्रकारसे सावधान रहे ही; क्योंकि जिसकी ओरसे भयकी आशंका नहीं है, उसकी ओरसे यदि भय उत्पन्न होता है तो वह जड़मूलसहित नष्ट कर देता है ॥ अवधानेन मौनेन काषायेण जटाजिनैः । विश्वासयित्वा द्वेषारमवलुम्पेद यथा वृकः ॥ ४६ ॥ 'शत्रुके हितके प्रति मनोयोग दिखाकर, मौनव्रत लेकर, गेरुआ वस्त्र पहनकर तथा जटा और मृगचर्म धारण करके अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करे और जब विश्वास हो जाय तो मौका देखकर भूखे भेड़ियेकी तरह शत्रुपर टूट पड़े ॥ ४६ ॥ पुत्रो वा यदि वा भ्राता पिता वा यदि वा सुहृत् ।