महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 957, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंऐन्द्राग्नेयेन विधिना चरुं श्रपयत स्वयम् ॥ ९५ ॥ ऐसा सोचकर मुनिने वेदोक्त विधिसे अग्निकी स्थापना करके इन्द्र और अग्निदेवताके उद्देश्यसे स्वयं ही चरु पकाकर तैयार किया ॥ ९५ ॥ ततः समारभत् कर्म दैवं पित्र्यं च भारत । आहूय देवानिन्द्रादीन् भागं भागं विधिक्रमात् ॥ ९६ ॥ भरतनन्दन! फिर उन्होंने देवकर्म और पितृकर्म आरम्भ किया। इन्द्र आदि देवताओंका आवाहन करके उनके लिये क्रमशः विधिपूर्वक पृथक्-पृथक् भाग अर्पित किया ॥ ९६ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु प्रववर्ष स वासवः । संजीवयन् प्रजाः सर्वा जनयामास चौषधीः ॥ ९७ ॥ इसी समय इन्द्रने समस्त प्रजाको जीवनदान देते हुए बड़ी भारी वर्षा की और अन्न आदि ओषधियोंको उत्पन्न किया ॥ ९७ ॥ विश्वामित्रोऽपि भगवांस्तपसा दग्धकिल्बिषः । कालेन महता सिद्धिमवाप परमाद्भुताम् ॥ ९८ ॥ भगवान् विश्वामित्र भी दीर्घकालतक निराहार व्रत एवं तपस्या करके अपने सारे पाप दग्ध कर चुके थे; अतः उन्हें अत्यन्त अद्भुत सिद्धि प्राप्त हुई ॥ ९८ ॥ स संहृत्य च तत् कर्म अनास्वाद्य च तद्धविः । तोषयामास देवांश्च पितूंश्च द्विजसत्तमः ॥ ९९ ॥ उन द्विजश्रेष्ठ मुनिने वह कर्म समाप्त करके उस हविष्यका आस्वादन किये बिना ही देवताओं और पितरोंको संतुष्ट कर दिया और उन्हींकी कृपासे पवित्र भोजन प्राप्त करके उसके द्वारा जीवनकी रक्षा की ॥ ९९ ॥ एवं विद्वानदीनात्मा व्यसनस्थो जिजीविषुः । सर्वोपायैरुपायज्ञो दीनमात्मानमुद्धरेत् ॥ १०० ॥ राजन्! इस प्रकार संकटमें पड़कर जीवनकी रक्षा चाहनेवाले विद्वान् पुरुषको दीनचित्त न होकर कोई उपाय ढूँढ़ निकालना चाहिये और सभी उपायोंसे अपने आपका आपत्कालमें परिस्थितिसे उद्धार करना चाहिये ॥ १०० ॥ एतां बुद्धिं समास्थाय जीवितव्यं सदा भवेत् । जीवन् पुण्यमवाप्नोति पुरुषो भद्रमश्नुते ॥ १०१ ॥ इस बुद्धिका सहारा लेकर सदा जीवित रहनेका प्रयत्न करना चाहिये; क्योंकि जीवित रहनेवाला पुरुष पुण्य करनेका अवसर पाता और कल्याणका भागी होता है ॥ १०१ ॥ तस्मात् कौन्तेय विदुषा धर्माधर्मविनिश्चये । बुद्धिमास्थाय लोकेऽस्मिन् वर्तितव्यं कृतात्मना ॥ १०२ ॥ अतः कुन्तीनन्दन! अपने मनको वशमें रखनेवाले विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह इस जगत्में धर्म और अधर्मका निर्णय करनेके लिये अपनी ही विशुद्ध बुद्धिका आश्रय लेकर