भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 969

उस समय मूसलाधार पानी बरस रहा था। बहेलिया शीतसे पीड़ित हो अचेत सा हो गया और व्याकुल हृदयसे सारे वनमें भटकने लगा ॥ २१ ॥

नैव निम्नं स्थलं वापि सोऽविन्दत विहङ्गहा ।
पूरितो हि जलौघेन तस्य मार्गो वनस्य च ॥ २२ ॥
वनका मार्ग जिसपर वह चलता था, जलके प्रवाहमें डूब गया था। उस बहेलियेको नीची-ऊँची भूमिका कुछ पता नहीं चलता था ॥ २२ ॥

पक्षिणो वर्षवेगेन हता लीनास्तदाभवन् ।
मृगसिंहवराहाश्च स्थलमाश्रित्य शेरते ॥ २३ ॥
वर्षके वेगसे बहुतेरे पक्षी मरकर धरतीपर लोट गये थे। कितने ही अपने घोंसलोंमें छिपे बैठे थे। मृग, सिंह और सूअर स्थल-भूमिका आश्रय लेकर सो रहे थे ॥

महता वातवर्षेण त्रासितास्ते वनौकसः ।
भयार्ताश्च क्षुधार्ताश्च बभ्रमुः सहिता वने ॥ २४ ॥
भारी आँधी और वर्षासे आतंकित हुए वनवासी जीव-जन्तु भय और भूखसे पीड़ित हो झुंड-के-झुंड एक साथ घूम रहे थे ॥ २४ ॥

स तु शीतहृतैर्गात्रैर्न जगाम न तस्थिवान् ।
ददर्श पतितां भूमौ कपोतीं शीतविह्वलाम् ॥ २५ ॥
बहेलियेके सारे अंग सर्दीसे ठिठुर गये थे। इसलिये न तो वह चल पाता था और न खड़ा ही हो पाता था। इसी अवस्थामें उसने धरतीपर गिरी हुई एक कबूतरी देखी, जो सर्दीके कष्टसे व्याकुल हो रही थी ॥ २५ ॥

दृष्ट्वाऽऽर्तोऽपि हि पापात्मा स तां पञ्जरकेऽक्षिपत् ।
स्वयं दुःखामिभूतोऽपि दुःखमेवाकरोत् परे ॥ २६ ॥
पापात्मा पापकारित्वात् पापमेव चकार सः ।
वह पापात्मा व्याध यद्यपि स्वयं भी बड़े कष्टमें था तो भी उसने उस कबूतरीको उठाकर पिंजड़ेमें डाल लिया। स्वयं दुःखसे पीड़ित होनेपर भी उसने दूसरे प्राणीको दुःख ही पहुँचाया। सदा पापमें ही प्रवृत्त रहनेके कारण उस पापात्माने उस समय भी पाप ही किया ॥ २६ १/२ ॥

सोऽपश्यत् तरुखण्डेषु मेघनीलवनस्पतिम् ॥ २७ ॥
सेव्यमानं विहङ्गौघैश्छायावासफलार्थिभिः ।
धात्रा परोपकाराय स साधुरिव निर्मितः ॥ २८ ॥
इतनेमें ही उसे वृक्षोंके समूहमें मेघके समान सघन एवं नील एक विशाल वृक्ष दिखायी दिया, जिसपर बहुतसे विहंग छाया, निवास और फलकी इच्छासे बसेरे लेते थे, मानो विधाताने परोपकारके लिये ही उस साधुतुल्य महान् वृक्षका निर्माण किया था ॥ २७-२८ ॥