महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 978, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मोहवश गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी पञ्चमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं करता, उसके लिये धर्मके अनुसार न तो यह लोक प्राप्त होता है और न परलोक ही ।। ७ ।।
तद् ब्रूहि मां सुविश्रब्धो यत् त्वं वाचा वदिष्यसि ।
तत् करिष्याम्यहं सर्वं मा त्वं शोके मनः कृथाः ।। ८ ।।
‘अतः तुम पूर्ण विश्वास रखकर मुझसे अपनी बात बताओ, तुम अपने मुँहसे जो कुछ कहोगे, वह सब मैं करूँगा; अतः तुम मनमें शोक न करो’ ।। ८ ।।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा शकुनेर्लुब्धकोऽब्रवीत् ।
बाधते खलु मे शीतं संत्राणं हि विधीयताम् ।। ९ ।।
कबूतरकी यह बात सुनकर व्याधने कहा—‘इस समय मुझे सर्दीका कष्ट है; अतः इससे बचानेका कोई उपाय करो’ ।। ९ ।।
एवमुक्तस्ततः पक्षी पर्णान्यास्तीर्य भूतले ।
यथाशक्त्या हि पर्णेन ज्वलनार्थं द्रुतं ययौ ।। १० ।।
उसके ऐसा कहनेपर पक्षीने पृथिवीपर बहुत-से पत्ते लाकर रख दिये और आग लानेके लिये अपने पंखोंद्वारा यथाशक्ति बड़ी तेजीसे उड़ान लगायी ।। १० ।।
स गत्वाङ्गारकर्म्मान्तं गृहीत्वाग्निमथागमत् ।
ततः शुष्केषु पर्णेषु पावकं सोऽप्यदीपयत् ।। ११ ।।
वह लुहारके घर जाकर आग ले आया और सूखे पत्तोंपर रखकर उसने वहाँ अग्नि प्रज्वलित कर दी ।।
स संदीप्तं महत् कृत्वा तमाह शरणागतम् ।
प्रतापय सुविश्रब्धः स्वगात्राण्यकुतोभयः ।। १२ ।।
इस प्रकार आगको बहुत प्रज्वलित करके कबूतरने शरणागत अतिथिसे कहा—‘भाई! अब तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम निश्चिन्त होकर अपने सारे अंगोंको आगसे तपाओ’ ।। १२ ।।
स तथोक्तस्तथेत्युक्त्वा लुब्धो गात्राण्यतापयत् ।
अग्निं प्रत्यागतप्राणस्ततः प्राह विहङ्गमम् ।। १३ ।।
तब उस व्याधने ‘बहुत अच्छा’ कहकर अपने सारे अंगोंको तपाया। अग्निका सेवन करके उसकी जानमें जान आयी। तब वह कबूतरसे कुछ कहनेको उद्यत हुआ ।। १३ ।।
हर्षेण महताऽऽविष्टो वाक्यं व्याकुललोचनः ।
तथेमं शकुनिं दृष्ट्वा विधिदृष्टेन कर्मणा ।। १४ ।।
शास्त्रीय विधिसे सत्कार पा उसने बड़े हर्षमें भरकर डबडबायी हुई आँखोंसे कबूतरकी ओर देखकर कहा— ।। १४ ।।
दत्तमाहारमिच्छामि त्वया क्षुद् बाधते हि माम् ।
स तद्वचः प्रतिश्रुत्य वाक्यमाह विहङ्गमः ।। १५ ।।