भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

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पृष्ठ 98

नष्टे शरीरे नष्टः स्याद् वृथा च स्यात् क्रियापथः ॥ ७ ॥ इसके विपरीत यदि शरीरके साथ ही जीवकी उत्पत्ति तथा उसके नष्ट होनेके साथ ही जीवका नाश होना माना जाय तब तो शरीर नष्ट होनेपर जीव भी नष्ट ही हो जायगा; उस दशामें सारा वैदिक कर्ममार्ग ही व्यर्थ सिद्ध होगा ॥ ७ ॥

तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः । पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता ॥ ८ ॥ इसलिये विज्ञ पुरुषको एकान्तमें रहनेका विचार छोड़कर पूर्ववर्ती तथा अत्यन्त पूर्ववर्ती श्रेष्ठ पुरुषोंने जिस मार्गका सेवन किया है, उसीका आश्रय लेना चाहिये ॥ ८ ॥

(स्वायम्भुवेन मनुना तथान्यैश्चक्रवर्तिभिः । यद्ययं ह्यधमः पन्थाः कस्मात् तैस्तैर्निषेवितः ॥ यदि आपकी दृष्टिमें गृहस्थ-धर्मका पालन करते हुए राज्यशासन करना अधम मार्ग है तो स्वायम्भुव मनु तथा उन-उन अन्य चक्रवर्ती नरेशोंने इसका सेवन क्यों किया था? ॥

कृतत्रेतादियुक्तानि गुणवन्ति च भारत । युगानि बहुशस्तैश्च भुक्तेयमवनी नृप ॥) भरतवंशी नरेश! उन नरपतियोंने उत्तम गुणवाले सत्ययुग-त्रेता आदि अनेक युगोंतक इस पृथ्वीका उपभोग किया है ॥

लब्ध्वापि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजंगमाम् । न भुंक्ते यो नृपःसम्यङ् निष्फलं तस्य जीवितम् ॥ ९ ॥ जो राजा चराचर प्राणियोंसे युक्त इस सारी पृथ्वीको पाकर इसका अच्छे ढंगसे उपभोग नहीं करता, उसका जीवन निष्फल है ॥ ९ ॥

अथवा वसतो राजन् वने वन्येन जीवतः । द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते ॥ १० ॥ अथवा राजन्! वनमें रहकर वनके ही फल-फूलोंसे जीवन-निर्वाह करते हुए भी जिस पुरुषकी द्रव्योंमें ममता बनी रहती है, वह मौतके ही मुखमें है ॥ १० ॥

बाह्यान्तरं च भूतानां स्वभावं पश्य भारत । ये तु पश्यन्ति तद् भूतं मुच्यन्ते ते महाभयात् ॥ ११ ॥ भरतनन्दन! प्राणियोंका बाह्य स्वभाव कुछ और होता है और आन्तरिक स्वभाव कुछ और। आप उसपर गौर कीजिये। जो सबके भीतर विराजमान परमात्माको देखते हैं, वे महान् भयसे मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥

भवान् पिता भवान् माता भवान् भ्राता भवान् गुरुः । दुःखप्रलापार्तस्य तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १२ ॥ प्रभो! आप मेरे पिता, माता, भ्राता और गुरु हैं। मैंने आर्त होकर दुःखमें जो-जो प्रलाप किये हैं, उन सबको आप क्षमा करें ॥ १२ ॥