भारतकोश
महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 980

ऐसा कहकर अतिथि-पूजनकी प्रतिज्ञा करके उस परम बुद्धिमान् पक्षीने तीन बार अग्निदेवकी परिक्रमा की, और हँसते हुए-से आगमें प्रवेश किया ।। २३ ।।

अग्निमध्ये प्रविष्टं तु लुब्धो दृष्ट्वा तु पक्षिणम् ।
चिन्तयामास मनसा किमिदं वै मया कृतम् ।। २४ ।।
पक्षीको आगके भीतर घुसा हुआ देख व्याध मन-ही-मन चिन्ता करने लगा कि मैंने यह क्या कर डाला? ।। २४ ।।

अहो मम नृशंसस्य गर्हितस्य स्वकर्मणा ।
अधर्मः सुमहान् घोरो भविष्यति न संशयः ।। २५ ।।
अहो! अपने कर्मसे निन्दित हुए मुझ क्रूरकर्मा व्याधके जीवनमें यह सबसे भयंकर और महान् पाप होगा, इसमें संशय नहीं है ।। २५ ।।

एवं बहुविधं भूरि विललाप स लुब्धकः ।
गर्हयन् स्वानि कर्माणि द्विजं दृष्ट्वा तथागतम् ।। २६ ।।
इस प्रकार कबूतरकी वैसी अवस्था देखकर अपने कर्मोंकी निन्दा करते हुए उस व्याधने अनेक प्रकारकी बातें कहकर बहुत विलाप किया ।। २६ ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि कपोतलुब्धकसंवादे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें कबूतर और व्याधका संवादविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४६ ।।