महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 987, कुल 2450 में से
संदर्भ में पढ़ेंयापि चैवंविधा नारी भर्तारमनुवर्तते । विराजते हि सा क्षिप्रं कपोतीव दिवि स्थिता ॥ १५ ॥ इसी प्रकार जो स्त्री अपने पतिका अनुसरण करती है, वह कपोतीके समान शीघ्र ही स्वर्गलोकमें स्थित हो अपने तेजसे प्रकाशित होती है ॥ १५ ॥
एवमेतत् पुरावृत्तं लुब्धकस्य महात्मनः । कपोतस्य च धर्मिष्ठा गतिः पुण्येन कर्मणा ॥ १६ ॥ यह प्राचीन वृत्तान्त (परशुरामजीने मुचुकुन्दको सुनाया था) यह ठीक ऐसा ही है। बहेलिये और महात्मा कबूतरको उनके पुण्यकर्मके प्रभावसे धर्मात्माओंकी गति प्राप्त हुई ॥ १६ ॥
यश्चेदं शृणुयान्नित्यं यश्चेदं परिकीर्तयेत् । नाशुभं विद्यते तस्य मनसापि प्रमादतः ॥ १७ ॥ जो मनुष्य इस प्रसंगको प्रतिदिन सुनता और जो इसका वर्णन करता है, उन दोनोंको मनसे भी प्रमादजनित अशुभकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १७ ॥
युधिष्ठिर महानेष धर्मो धर्मभृतां वर । गोध्नेष्वपि भवेदस्मिन्निष्कृतिः पापकर्मणः ॥ १८ ॥ धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! यह शरणागतका पालन महान् धर्म है। ऐसा करनेसे गोवध करनेवाले पुरुषोंके पापका भी प्रायश्चित्त हो जाता है ॥ १८ ॥
न निष्कृतिर्भवेत् तस्य यो हन्याच्छरणागतम् । इतिहासमिमं श्रुत्वा पुण्यं पापप्रणाशनम् । न दुर्गतिमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ १९ ॥ जो शरणागतका वध करता है, उसको कभी इस पापसे छुटकारा नहीं मिलता। इस पापनाशक पुण्यमय इतिहासको सुन लेनेपर मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। उसे स्वर्गलोककी प्रप्ति होती है ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि लुब्धकस्वर्गगमने एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें व्याधका स्वर्गलोकमें गमनविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४९ ॥