भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

कुर्यादुभयतः शेषं दत्तशेषं न शेषयेत् ।। २७ ।।

क्रोधरहित—क्षमाशील ब्राह्मणको पाकर क्षत्रियकी ओरसे अधिक मात्रामें प्रयुक्त किये

गये तप और तेज आगपर रूईके ढेरके समान तत्काल नष्ट हो जाते हैं। यदि दोनों ओरसे

एक-दूसरेपर तेज और तपका प्रयोग हो तो उनका सर्वथा नाश नहीं होता; परंतु क्षमाशील

ब्राह्मणके द्वारा खण्डित होनेसे बचा हुआ क्षत्रियका तेज किसी तेजस्वी ब्राह्मणपर प्रयुक्त

हो तो वह उससे प्रतिहत होकर सर्वथा नष्ट हो जाता है, थोड़ा-सा भी शेष नहीं रह

जाता ।। २७ ।।

दण्डपाणिर्यथा गोषु पालो नित्यं हि रक्षयेत् ।

ब्राह्मणान् ब्रह्म च तथा क्षत्रियः परिपालयेत् ।। २८ ।।

जैसे चरवाहा हाथमें डंडा लेकर सदा गौओंकी रखवाली करता है, उसी प्रकार

क्षत्रियको उचित है कि वह ब्राह्मणों और वेदोंकी सदा रक्षा करे ।। २८ ।।

पितेव पुत्रान् रक्षेथा ब्राह्मणान् धर्मचेतसः ।

गृहे चैषामवेक्षेथाः किंस्विदस्तीति जीवनम् ।। २९ ।।

राजाको चाहिये कि वह धर्मात्मा ब्राह्मणोंकी उसी तरह रक्षा करे, जैसे पिता पुत्रोंकी

करता है। वह सदा इस बातकी देख-भाल करता रहे कि उनके घरमें जीवन-निर्वाहके लिये

क्या है और क्या नहीं है ।। २९ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अष्टमोऽध्यायः ।। ८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी

प्रशंसाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८ ।।

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३० १/३ श्लोक हैं)