महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1009, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमासि मास्यश्वमेधेन यो यजेत शतं समाः । न खादति च यो मांसं सममेतन्मतं मम ॥ १४ ॥ जो सौ वर्षोंतक प्रतिमास अश्वमेध यज्ञ करता है और जो कभी मांस नहीं खाता है— इन दोनोंका समान फल माना गया है ॥ १४ ॥
सदा यजति सत्रेण सदा दानं प्रयच्छति । सदा तपस्वी भवति मधुमांसविवर्जनात् ॥ १५ ॥ मद्य और मांसका परित्याग करनेसे मनुष्य सदा यज्ञ करनेवाला, सदा दान देनेवाला और सदा तप करनेवाला होता है ॥ १५ ॥
सर्वे वेदा न तत् कुर्य्युः सर्वे यज्ञाश्च भारत । यो भक्षयित्वा मांसानि पश्चादपि निवर्तते ॥ १६ ॥ भारत! जो पहले मांस खाता रहा हो और पीछे उसका सर्वथा परित्याग कर दे, उसको जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे सम्पूर्ण वेद और यज्ञ भी नहीं प्राप्त करा सकते ॥ १६ ॥
दुष्करं च रसज्ञाने मांसस्य परिवर्जनम् । चर्तुं व्रतमिदं श्रेष्ठं सर्वप्राण्यभयप्रदम् ॥ १७ ॥ मांसके रसका आस्वादन एवं अनुभव कर लेनेपर उसे त्यागना और समस्त प्राणियोंको अभय देनेवाले इस सर्वश्रेष्ठ अहिंसाव्रतका आचरण करना अत्यन्त कठिन हो जाता है ॥ १७ ॥
सर्वभूतेषु यो विद्वान् ददात्यभयदक्षिणाम् । दाता भवति लोके स प्राणानां नात्र संशयः ॥ १८ ॥ जो विद्वान् सब जीवोंको अभयदान कर देता है, वह इस संसारमें निःसंदेह प्राणदाता माना जाता है ॥ १८ ॥
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः । प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा ॥ १९ ॥ इस प्रकार मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्मकी प्रशंसा करते हैं। जैसे मनुष्यको अपने प्राण प्रिय होते हैं, उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको अपने-अपने प्राण प्रिय जान पड़ते हैं ॥ १९ ॥
आत्मौपम्येन मन्तव्यं बुद्धिमद्भिः कृतात्मभिः । मृत्युतो भयमस्तीति विदुषां भूतिमिच्छताम् ॥ २० ॥ किं पुनर्हन्यमानानां तरसा जीवितार्थिनाम् । अरोगाणामपापानां पापैर्मांसोपजीविभिः ॥ २१ ॥ अतः जो बुद्धिमान् और पुण्यात्मा है, उन्हें चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान समझें। जब अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले विद्वानोंको भी मृत्युका भय बना रहता है,