भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1016, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1016

जो धर्मात्मा पुरुष जन्मसे ही इस जगत्में शहद, मद्य और मांसका सदाके लिये परित्याग कर देते हैं, वे सब-के-सब मुनि माने गये हैं ।। ७० ।। इमं धर्मममांसादं यश्चरेच्छ्रावयीत वा । अपि चेत् सुदुराचारो न जातु निरयं व्रजेत् ।। ७१ ।। जो मांस-भक्षणके परित्यागरूप इस धर्मका आचरण करता अथवा इसे दूसरोंको सुनाता है, वह कितना ही दुराचारी क्यों न रहा हो, नरकमें नहीं पड़ता ।। ७१ ।। पठेद् वा य इदं राजन् शृणुयाद् वाप्यभीक्ष्णशः । अमांसभक्षणविधिं पवित्रमृषिपूजितम् ।। ७२ ।। विमुक्तः सर्वपापेभ्यः सर्वकामैर्महीयते । विशिष्टतां ज्ञातिषु च लभते नात्र संशयः ।। ७३ ।। राजन्! जो ऋषियोंद्वारा सम्मानित एवं पवित्र इस मांस-भक्षणके त्यागके प्रकरणको पढ़ता अथवा बारंबार सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो सम्पूर्ण मनोवांछित भोगोंद्वारा सम्मानित होता है और अपने सजातीय बन्धुओंमें विशिष्ट स्थान प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ।। ७२-७३ ।। आपन्नश्चापदो मुच्येद् बद्धो मुच्येत बन्धनात् । मुच्येत्तथाऽऽतुरो रोगाद् दुःखान्मुच्येत दुःखितः ।। ७४ ।। इतना ही नहीं, इसके श्रवण अथवा पठनसे आपत्तिमें पड़ा हुआ आपत्तिसे, बन्धनमें बँधा हुआ बन्धनसे, रोगी रोगसे और दुःखी दुःखसे छुटकारा पा जाता है ।। ७४ ।। तिर्यग्योनिं न गच्छेत रूपवांश्च भवेन्नरः । ऋद्धिमान् वै कुरुश्रेष्ठ प्राप्नुयाच्च महद् यशः ।। ७५ ।। कुरुश्रेष्ठ! इसके प्रभावसे मनुष्य तिर्यग्योनिमें नहीं पड़ता तथा उसे सुन्दर रूप, सम्पत्ति और महान् यशकी प्राप्ति होती है ।। ७५ ।। एतत्ते कथितं राजन् मांसस्य परिवर्जने । प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च विधानमृषिनिर्मितम् ।। ७६ ।। राजन्! यह मैंने तुम्हें ऋषियोंद्वारा निर्मित मांस-त्यागका विधान तथा प्रवृत्तिविषयक धर्म भी बताया है ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मांसभक्षणनिषेधे पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११५ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मांसभक्षणका निषेधविषयक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११५ ।।