भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1028, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1028

कीट! एक जगह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हैं। वे जीवनमें सदा सूर्य और चन्द्रमाकी पूजा किया करते हैं तथा लोगोंको पवित्र कथाएँ सुनाया करते हैं। उन्हींके यहाँ तुम (क्रमशः) पुत्ररूपसे जन्म लोगे ।। ६ ।। गुणभूतानि भूतानि तत्र त्वमुपभोक्ष्यसे । तत्र तेऽहं विनेष्यामि ब्रह्म त्वं यत्र वैष्यसि ॥ ७ ॥ वहाँ विषयोंको पंचभूतोंका विकार मानकर अनासक्तभावसे उपभोग करोगे। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर ब्रह्मविद्याका उपदेश करूँगा तथा तुम जिस लोकमें जाना चाहोगे, वहीं तुम्हें पहुँचा दूँगा ।। ७ ।। स तथेति प्रतिश्रुत्य कीटो वर्त्मन्यतिष्ठत । शकटो व्रजंश्च सुमहानागतश्च यदृच्छया ।। ८ ।। चक्राक्रमेण भिन्नश्च कीटः प्राणान् मुमोच ह । व्यासजीके इस प्रकार कहनेपर उस कीड़ेने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और बीच रास्तेमें जाकर वह ठहर गया। इतनेहीमें वह विशाल छकड़ा अकस्मात् वहाँ आ पहुँचा और उसके पहियेसे दबकर चूर-चूर हो कीड़ेने प्राण त्याग दिये ।। ८ १/२ ।। सम्भूतः क्षत्रियकुले प्रसादादमितौजसः ।। ९ ।। तमृषिं द्रष्टुमगमत् सर्वास्र्वन्यासु योनिषु । श्वाविद्रोधावराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ।। १० ।। श्वपाकद्रशूद्रवैश्यानां क्षत्रियाणां च योनिषु । तत्पश्चात् वह क्रमशः शाही, गोधा, सूअर, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्यकी योनिमें जन्म लेता हुआ क्षत्रिय-जातिमें उत्पन्न हुआ। अन्य सारी योनियोंमें भ्रमण करनेके बाद अमित तेजस्वी व्यासजीकी कृपासे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर वह उन महर्षिका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ।। ९-१० १/२ ।। स कीट एवमाभाष्य ऋषिणा सत्यवादिना । प्रतिस्मृत्याथ जग्राह पादौ मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ।। ११ ।। वह कीट-योनिमें उन सत्यवादी महर्षि वेदव्यासजीके साथ बातचीत करके जो इस प्रकार उन्नतिशील हुआ था, उसकी याद करके उस क्षत्रियने हाथ जोड़कर ऋषिके चरणोंमें अपना मस्तक रख दिया ।। ११ ।।

कीट उवाच

इदं तदतुलं स्थानमीप्सितं दशभिर्गुणैः । यदहं प्राप्य कीटत्वमागतो राजपुत्रताम् ।। १२ ।। कीट (क्षत्रिय) ने कहा— भगवन्! आज मुझे वह स्थान मिला है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है। इसे मैं दस जन्मोंसे पाना चाहता था। यह आपकीही कृपा है कि मैं अपने दोषसे