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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 1032

महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रजा धर्मेण पाल्य च ।। ६ ।।
अचिरेणैव कालेन कीटः पार्थिवसत्तम ।
प्रजापालनधर्मेण प्रेत्य विप्रत्वमागतः ।। ७ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यासका वचन सुनकर धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करने लगा। तत्पश्चात् वह पुनः वनमें जाकर थोड़े ही समयमें परलोकवासी हो प्रजापालनरूप धर्मके प्रभावसे ब्राह्मण-कुलमें जन्म पा गया ।। ६-७ ।।

ततस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा पुनरेव महायशाः ।
आजगाम महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनस्तदा ।। ८ ।।
उसे ब्राह्मण हुआ जान महायशस्वी महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास पुनः उसके पास आये ।। ८ ।।

व्यास उवाच

भो भो ब्रह्मर्षभ श्रीमन् मा व्यथिष्ठाः कथंचन ।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ।। ९ ।।
**व्यासजीने कहा—**ब्राह्मणशिरोमणे! अब तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। उत्तम कर्म करनेवाला उत्तम योनियोंमें और पाप करनेवाला पाप-योनियोंमें जन्म लेता है ।। ९ ।।

उपपद्यति धर्मज्ञ यथापापफलोपगम् ।
तस्मान्मृत्युभयात् कीट मा व्यथिष्ठाः कथंचन ।। १० ।।
धर्मलोपभयं ते स्यात् तस्माद् धर्मं चरोत्तमम् ।
धर्मज्ञ! मनुष्य जैसा पाप करता है, उसके अनुसार ही उसे फल भोगना पड़ता है। अतः भूतपूर्व कीट! अब तुम मृत्युके भयसे किसी प्रकार व्यथित न होओ। हाँ, तुम्हें धर्मके लोपका भय अवश्य होना चाहिये, इसलिये उत्तम धर्मका आचरण करते रहो ।। १० १/२ ।।

कीट उवाच

सुखात् सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम् ।। ११ ।।
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य पाप्मा नष्ट इहाद्य मे ।
**भूतपूर्व कीटने कहा—**भगवन्! आपके ही प्रयत्नसे मैं अधिकाधिक सुखकी अवस्थाको प्राप्त होता गया हूँ। अब इस जन्ममें धर्ममूलक सम्पत्ति पाकर मेरा सारा पाप नष्ट हो गया ।। ११ १/२ ।।

भीष्म उवाच

भगवद्वचनात् कीटो ब्राह्मण्यं प्राप्य दुर्लभम् ।। १२ ।।