भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1058, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1058

निशाचर! तुम्हारे मित्र तुम्हारे द्वारा भलीभाँति सम्मानित होनेपर भी अपने स्वभावदोषके कारण तुमसे विमुख रहते हैं; इसीलिये तुम चिन्तावश दुबले होकर सफेद पड़ते जा रहे हो ॥ १० ॥ धनैश्वर्याधिकाः स्तब्धास्त्वद्गुणैः परमावराः । अवजानन्ति नूनं त्वां तेनासि हरिणः कृशः ॥ ११ ॥ जो गुणोंमें तुम्हारी अपेक्षा निम्नश्रेणीके हैं, वे जड मनुष्य भी धन और ऐश्वर्यमें अधिक होनेके कारण निश्चय ही सदा तुम्हारी अवहेलना किया करते हैं; इसीलिये तुम दुर्बल और सफेद (पीले) होते जा रहे हो ॥ ११ ॥ गुणवान् विगुणानन्यान् नूनं पश्यसि सत्कृतान् । प्राज्ञोऽप्राज्ञान् विनीतात्मा तेनासि हरिणः कृशः ॥ १२ ॥ तुम गुणवान्, विद्वान् एवं विनीत होनेपर भी सम्मान नहीं पाते और गुणहीन तथा मूढ़ व्यक्तियोंको सम्मानित होते देखते हो; इसीलिये तुम्हारे शरीरका रंग फीका पड़ गया है और तुम दुर्बल हो गये हो ॥ १२ ॥ अवृत्त्या क्लिश्यमानोऽपि वृत्त्युपायान् विगर्हयन् । माहात्म्याद् व्यथसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ १३ ॥ जीवन-निर्वाहका कोई उपाय न होनेसे तुम क्लेश उठाते होगे, किंतु अपने गौरवके कारण जीविकाके प्रतिग्रह आदि उपायोंकी निन्दा करते हुए उन्हें स्वीकार नहीं करते होगे। यही तुम्हारी उदासी और दुर्बलताका कारण है ॥ १३ ॥ सम्पीड्यात्मानमार्यत्वात् त्वया कश्चिदुपस्कृतः । जितं त्वां मन्यते साधो तेनासि हरिणः कृशः ॥ १४ ॥ साधो! तुम सज्जनताके कारण अपने शरीरको कष्ट देकर भी जब किसीका उपकार करते हो; तब वह तुम्हें अपनी शक्तिसे पराजित समझता है; इसीलिये तुम कृशकाय और सफेद होते जा रहे हो ॥ १४ ॥ क्लिश्यमानान् विमार्गेषु कामक्रोधावृतात्मनः । मन्ये त्वं ध्यायसि जनांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ १५ ॥ जिनका चित्त काम और क्रोधसे आक्रान्त है, अतएव जो कुमार्गपर चलकर कष्ट भोग रहे हैं। सम्भवतः ऐसे ही लोगोंके लिये तुम सदा चिन्तित रहते हो; इसीलिये दुर्बल होकर सफेद (पीले) पड़ते जा रहे हो ॥ १५ ॥ प्रज्ञासम्भावितो नूनमप्रज्ञैरुपसंहितः । हीयमानोऽसि दुर्वृत्तैस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ १६ ॥ यद्यपि तुम अपनी उत्तम बुद्धिके द्वारा सम्मानके योग्य हो तो भी अज्ञानी पुरुष तुम्हारी हँसी उड़ाते हैं और दुराचारी मनुष्य तुम्हारा तिरस्कार करते हैं। इसी चिन्तासे तुम्हारा शरीर सूखकर पीला पड़ता जा रहा है ॥ १६ ॥

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