महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1061, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनूनमासंजयित्वा त्वां कृत्ये कस्मिंश्चिदीप्सिते । कश्चिदर्थयते नित्यं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २५ ॥ निश्चय ही कोई मनुष्य अपनी इच्छाके अनुसार किसी अभीष्ट कार्यमें नियुक्त करके सदा अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है; इसीलिये तुम श्वेत (पीत) वर्णके और दुबले हो रहे हो ॥ २५ ॥
नूनं त्वां सुगुणैर्युक्तं पूजयानं सुहृद्ध्रुवम् । ममार्थ इति जानीते तेनासि हरिणः कृशः ॥ २६ ॥ अवश्य ही तुम सद्गुणोंसे युक्त होनेके कारण दूसरे लोगोंद्वारा पूजित होते हो; परंतु तुम्हारा मित्र समझता है कि यह मेरे ही प्रभावसे आदर पा रहा है। इसीलिये तुम चिन्तासे दुर्बल एवं पीले होते जा रहे हो ॥ २६ ॥
अन्तर्गतमभिप्रायं नूनं नेच्छसि लज्जया । विवेक्तुं प्राप्तिशैथिल्यात् तेनासि हरिणः कृशः ॥ २७ ॥ निश्चय ही तुम लज्जावश किसीपर अपना आन्तरिक अभिप्राय नहीं प्रकट करना चाहते, क्योंकि तुम्हें अपनी अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके विषयमें संदेह है, इसीलिये चिन्तावश सूखते और पीले पड़ते जा रहे हो ॥ २७ ॥
नानाबुद्धिरुचो लोके मनुष्यान् नूनमिच्छसि । ग्रहीतुं स्वगुणैः सर्वांस्तेनासि हरिणः कृशः ॥ २८ ॥ निश्चय ही संसारमें नाना प्रकारकी बुद्धि और भिन्न-भिन्न रुचि रखनेवाले लोग रहते हैं। उन सबको तुम अपने गुणोंसे वशमें करना चाहते हो। इसीलिये क्षीणकाय और पाण्डुवर्णके हो रहे हो ॥ २८ ॥
अविद्वान् भीरुरल्पार्थे विद्याविक्रमदानजम् । यशः प्रार्थयसे नूनं तेनासि हरिणः कृशः ॥ २९ ॥ अथवा यह भी हो सकता है कि तुम विद्वान् न होकर भी विद्यासे मिलनेवाले यशको पाना चाहते हो। डरपोक और कायर होनेपर भी पराक्रमजनित कीर्ति पानेकी अभिलाषा रखते हो और अपने पास बहुत थोड़ा धन होनेपर भी दानवीर होनेका यश पानेके लिये उत्सुक हो। इसीलिये कृशकाय और पीले हो रहे हो ॥ २९ ॥
चिराभिलषितं किंचित्फलमप्राप्तमेव ते । कृतमन्यैरपहृतं तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३० ॥ तुमने कोई कार्य किया, जिसका चिरकालसे अभिलषित कोई फल तुम्हें प्राप्त होनेवाला था, किंतु तुम्हें तो वह प्राप्त हुआ नहीं और दूसरे लोग उसे हर ले गये। इसीलिये तुम्हारे शरीरकी कान्ति फीकी पड़ गयी है और दिनोंदिन दुबले होते जा रहे हो ॥ ३० ॥
नूनमात्मकृतं दोषमपश्यन् किंचिदात्मनः । अकारणेऽभिशप्तोऽसि तेनासि हरिणः कृशः ॥ ३१ ॥