भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1064

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

जन्म मानुष्यकं प्राप्य कर्मक्षेत्रं सुदुर्लभम् ।
श्रेयोऽर्थिना दरिद्रेण किं कर्तव्यं पितामह ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! मनुष्यकुलमें जन्म और परम दुर्लभ कर्मक्षेत्र पाकर अपना कल्याण चाहनेवाले दरिद्र पुरुषको क्या करना चाहिये? ॥ १ ॥

दानानामुत्तमं यच्च देयं यच्च यथा यथा ।
मान्यान् पूज्यांश्च गाङ्गेय रहस्यं वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
गंगानन्दन! सब दानोंमें जो उत्तम दान है, जिस वस्तुका जिस-जिस प्रकारसे दान करना उचित है तथा जो माननीय और पूजनीय हैं—इन सब रहस्यमय (गोपनीय) विषयोंका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना ।
धर्माणां परमं गुह्यं भीष्मः प्रोवाच पार्थिवम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भीष्मजीने उनसे धर्मका परम गुह्य रहस्य बताना आरम्भ किया ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् धर्मगुह्यानि भारत ।
यथा हि भगवान् व्यासः पुरा कथितवान् मयि ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! भरतनन्दन! पूर्वकालमें भगवान् वेदव्यासने मुझे धर्मके जो गूढ़ रहस्य बताये थे, उनका वर्णन करता हूँ, सावधान होकर सुनो ॥ ४ ॥

देवगुह्यमिदं राजन् यमेनाक्लिष्टकर्मणा ।
नियमस्थेन युक्तेन तपसो महतः फलम् ॥ ५ ॥
राजन्! अनायास ही महान् कर्म करनेवाले यमने नियमपरायण और योगयुक्त होकर महान् तपके फलस्वरूप इस देवगुह्य रहस्यको प्राप्त किया था ॥ ५ ॥