भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1082, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1082

जिसके घरसे अतिथि निराश लौट जाता है, उसके यहाँसे अतिथिका सत्कार न होनेके कारण देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश लौट जाते हैं ।। २६-२७ ।। स्त्रीघ्नैर्गोघ्नैः कृतघ्नैश्च ब्रह्मघ्नैर्गुरुतल्पगैः । तुल्यदोषो भवत्येभिर्यस्यातिथिर्नार्चितः ।। २८ ।। जिसके यहाँ अतिथिका सत्कार नहीं होता, उस पुरुषको स्त्रीहत्यारों, गोघातकों, कृतघ्नों, ब्रह्मघातियों और गुरुपत्नीगामियोंके समान पाप लगता है ।। २८ ।।

अग्निरुवाच

पादमुद्यम्य यो मर्त्यः स्पृशेद् गाश्च सुदुर्मतिः । ब्राह्मणं वा महाभागं दीप्यमानं तथानलम् ।। २९ ।। तस्य दोषान् प्रवक्ष्यामि तच्छृणुध्वं समाहिताः । अग्नि बोले— जो दुर्बुद्धि मनुष्य लात उठाकर उससे गौका, महाभाग ब्राह्मणका अथवा प्रज्वलित अग्निका स्पर्श करता है, उसके दोष बता रहा हूँ, सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो ।। २९ १/२ ।। दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै ।। ३० ।। वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम् । पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति ।। ३१ ।। ऐसे मनुष्यकी अपकीर्ति स्वर्गतक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो उठते हैं। देवताओंमें भी उसके प्रति भारी वैमनस्य हो जाता है तथा महातेजस्वी पावक उसके दिये हुए हविष्यको नहीं ग्रहण करते हैं ।। ३०-३१ ।। आजन्मनां शतं चैव नरके पच्यते तु सः । निष्कृतिं च न तस्यापि अनुमन्यन्ति कर्हिचित् ।। ३२ ।। वह सौ जन्मोंतक नरकमें पकाया जाता है। ऋषिगण कभी उसके उद्धारका अनुमोदन नहीं करते हैं ।। तस्माद् गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन । ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथानलः ।। ३३ ।। श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता । एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु यः पादमुत्सृजेत् ।। ३४ ।। इसलिये अपना हित चाहनेवाले श्रद्धालु पुरुषको गौओंका, महातेजस्वी ब्राह्मणका तथा प्रज्वलित अग्निका भी कभी पैरसे स्पर्श नहीं करना चाहिये। जो इन तीनोंपर पैर उठाता है, उसे प्राप्त होनेवाले इन दोषोंका मैंने वर्णन किया है ।। ३३-३४ ।।

विश्वामित्र उवाच

श्रूयतां परमं गुह्यं रहस्यं धर्मसंहितम् ।