महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1087, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें**लक्ष्मी बोलीं—**जिस घरमें सब पात्र इधर-उधर बिखरे पड़े हों, बर्तन फूटे और आसन फटे हों तथा जहाँ स्त्रियाँ मारी-पीटी जाती हों, वह घर पापके कारण दूषित होता है। पापसे दूषित हुए उस गृहसे उत्सव और पर्वके अवसरोंपर देवता और पितर निराश लौट जाते हैं—उस घरकी पूजा नहीं स्वीकार करते ।। ६-७ ।।
अंगिरा उवाच
यस्तु संवत्सरं पूर्णं दद्याद् दीपं करञ्जके । सुवर्चलामूलहस्तः प्रजा तस्य विवर्धते ।। ८ ।। **अंगिराने कहा—**जो पूरे एक वर्षतक करंज (करज) वृक्षके नीचे दीपदान करे और ब्राह्मीबूटीकी जड़ हाथमें लिये रहे, उसकी संतति बढ़ती है ।। ८ ।।
गार्ग्य उवाच
आतिथ्यं सततं कुर्याद् दीपं दद्यात् प्रतिश्रये । वर्जयानो दिवा स्वापं न च मांसानि भक्षयेत् ।। ९ ।। गोब्राह्मणं न हिंस्याच्च पुष्कराणि च कीर्तयेत् । एष श्रेष्ठतमो धर्मः सरहस्यो महाफलः ।। १० ।। **गार्ग्यने कहा—**सदा अतिथियोंका सत्कार करे, घरमें दीपक जलाये, दिनमें सोना छोड़ दे। मांस कभी न खाय। गौ और ब्राह्मणकी हत्या न करे तथा तीनों पुष्कर तीर्थोंका प्रतिदिन नाम लिया करे। यह रहस्यसहित श्रेष्ठतम धर्म महान् फल देनेवाला है ।। ९-१० ।।
अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धविः । न तु क्षीयन्ति ते धर्माः श्रद्दधानैः प्रयोजिताः ।। ११ ।। सैकड़ों बार किये हुए यज्ञका फल भी क्षीण हो जाता है; किंतु श्रद्धालु पुरुषोंद्वारा उपर्युक्त धर्मोंका पालन किया जाय तो वे कभी क्षीण नहीं होते ।। ११ ।।
इदं च परमं गुह्यं सरहस्यं निबोधत । श्राद्धकल्पे च दैवे च तीर्थिके पर्वणीषु च ।। १२ ।। रजस्वला च या नारी श्वित्रिकापुत्रिका च या । एताभिश्चक्षुषा दृष्टं हविर्नाश्नन्ति देवताः ।। १३ ।। पितरश्च न तुष्यन्ति वर्षाण्यपि त्रयोदश । यह परम गोपनीय रहस्यकी बात सुनो। श्राद्धमें, यज्ञमें, तीर्थमें और पर्वोंके दिन देवताओंके लिये जो हविष्य तैयार किया जाता है, उसे यदि रजस्वला, कोढ़ी अथवा वन्ध्या स्त्री देख ले तो उनके नेत्रोंद्वारा देखे हुए हविष्यको देवता नहीं ग्रहण करते हैं तथा पितर भी तेरह वर्षोंतक असंतुष्ट रहते हैं ।। १२-१३½ ।।
शुक्लवासाः शुचिर्भूत्वा ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत् । कीर्तयेद् भारतं चैव तथा स्यादक्षयं हविः ।। १४ ।।