भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1099, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1099

फल मिलता है, उसे सुनो। उसे साँड़ों-सहित सौ गौओंके दानका शाश्वत फल प्राप्त होता है।।

पापं कर्म च यत् किंचिद् ब्रह्महत्यासमं भवेत् ।
शोधयेत् कपिला ह्येका प्रदत्तं गोशतं यथा ॥ ३१ ॥
तस्मात्तु कपिला देया कौमुद्यां ज्येष्ठपुष्करे ।
ब्रह्महत्याके समान जो कोई पाप होता है, उसे एकमात्र कपिलाका दान शुद्ध कर देता है। वह एक ही गोदान सौ गोदानोंके बराबर है। इसलिये ज्येष्ठपुष्कर तीर्थमें कार्तिककी पूर्णिमाको अवश्य कपिला गौका दान करना चाहिये ॥ ३१ १/२ ॥

न तेषां विषमं किंचिन्न दुःखं न च कण्टकाः ॥ ३२ ॥
उपानहौ च यो दद्यात् पात्रभूते द्विजोत्तमे ।
छत्रदाने सुखं छायां लभते परलोकगः ॥ ३३ ॥
जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मणको उपानह (जूता) दान करता है, उसके लिये कहीं कोई विषम स्थान नहीं है। न उसे दुःख उठाना पड़ता है और न काँटोंका ही सामना करना पड़ता है। छत्र-दान करनेसे परलोकमें जानेपर दाताको सुखदायिनी छाया सुलभ होती है ॥

न हि दत्तस्य दानस्य नाशोऽस्तीह कदाचन ।
चित्रगुप्तमतं श्रुत्वा हृष्टरोमा विभावसुः ॥ ३४ ॥
उवाच देवताः सर्वाः पितॄंश्चैव महाद्युतिः ।
श्रुतं हि चित्रगुप्तस्य धर्मगुह्यं महात्मनः ॥ ३५ ॥
इस लोकमें दिये हुए दानका कभी नाश नहीं होता। चित्रगुप्तका यह मत सुनकर भगवान् सूर्यके शरीरमें रोमांच हो आया। उन महातेजस्वी सूर्यने सम्पूर्ण देवताओं और पितरोंसे कहा—'आपलोगोंने महामना चित्रगुप्तके धर्मविषयक गुप्त रहस्यको सुन लिया ॥

श्रद्दधानाश्च ये मर्त्या ब्राह्मणेषु महात्मसु ।
दानमेतत् प्रयच्छन्ति न तेषां विद्यते भयम् ॥ ३६ ॥
'जो मनुष्य महामनस्वी ब्राह्मणोंपर श्रद्धा करके यह दान देते हैं, उन्हें भय नहीं होता' ॥ ३६ ॥

धर्मदोषास्त्विमे पञ्च येषां नास्तीह निष्कृतिः ।
असम्भाष्या अनाचारा वर्जनीया नराधमाः ॥ ३७ ॥
आगे बताये जानेवाले पाँच धर्मविषयक दोष जिनमें विद्यमान हैं, उनका यहाँ कभी उद्धार नहीं होता। ऐसे अनाचारी नराधमोंसे बात नहीं करनी चाहिये। उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये ॥ ३७ ॥

ब्रह्महा चैव गोघ्नश्च परदाररतश्च यः ।
अश्रद्दधानश्च नरः स्त्रियं यश्चोपजीवति ॥ ३८ ॥