महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1107, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः
महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्य
महेश्वर उवाच
सारमुद्धृत्य युष्माभिः साधुधर्म उदाहृतः ।
धर्मगुह्यमिदं मत्तः शृणुध्वं सर्व एव ह ॥ १ ॥
(ऋषि, मुनि, देवता और पितरोंसे) महेश्वर बोले—तुमलोगोंने धर्मशास्त्रका सार निकालकर उत्तम धर्मका वर्णन किया है। अब सब लोग मुझसे धर्म-सम्बन्धी इस गूढ़ रहस्यका वर्णन सुनो ॥ १ ॥
येषां धर्माश्रिता बुद्धिः श्रद्धानाश्च ये नराः ।
तेषां स्यादुपदेष्टव्यः सरहस्यो महाफलः ॥ २ ॥
जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है और जो मनुष्य परम श्रद्धालु हैं, उन्हींको इस महान् फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका उपदेश देना चाहिये ॥ २ ॥
निरुद्विग्नस्तु यो दद्यान्मासमेकं गवाहिकम् ।
एकभक्तं तथाश्नीयाच्छ्रूयतां तस्य यत् फलम् ॥ ३ ॥
जो उद्वेगरहित होकर एक मासतक प्रतिदिन गौको भोजन देता है और स्वयं एक ही समय खाता है, उसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन सुनो ॥ ३ ॥
इमा गावो महाभागाः पवित्रं परमं स्मृताः ।
त्रीँल्लोँकान् धारयन्ति स्म सदेवासुरमानुषान् ॥ ४ ॥
ये गौएँ परम सौभाग्यशालिनी और अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैं। ये देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको धारण करती हैं ॥ ४ ॥
तासु चैव महापुण्यं शुश्रूषा च महाफलम् ।
अहन्यहनि धर्मेण युज्यते वै गवाहिकः ॥ ५ ॥
इनकी सेवा करनेसे बहुत बड़ा पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है। प्रतिदिन गौओंको भोजन देनेवाला मनुष्य नित्य महान् धर्मका उपार्जन करता है ॥ ५ ॥
मया ह्येता ह्यनुज्ञाताः पूर्वमासन् कृते युगे ।
ततोऽहमनुनीतो वै ब्रह्मणा पद्मयोनिना ॥ ६ ॥
मैंने पहले सत्ययुगमें गौओंको अपने पास रहनेकी आज्ञा दी थी। पद्मयोनि ब्रह्माजीने इसके लिये मुझसे बहुत अनुनय-विनय की थी ॥ ६ ॥
तस्माद् व्रजस्थानगतस्तिष्ठत्युपरि मे वृषः ।
रमेऽहं सह गोभिश्च तस्मात् पूज्याः सदैव ताः ॥ ७ ॥