भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 1122, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 1122

अर्घ्यं प्रदाय विधिवल्लेभे लोकाननुत्तमान् ॥ ६ ॥ संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवने महात्मा वसिष्ठ मुनिको विधिवत् अर्घ्यदान किया, जिससे उन्हें श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ ६ ॥

दिव्यं शतशलाकं च यज्ञार्थं काञ्चनं शुभम् । छत्रं देवावृधो दत्त्वा ब्राह्मणायास्थितो दिवम् ॥ ७ ॥ देवावृध नामक राजा यज्ञमें सोनेकी सौ तीलियोंवाले सुन्दर दिव्य छत्रका ब्राह्मणको दान करके स्वर्ग-लोकको प्राप्त हुए हैं ॥ ७ ॥

भगवानम्बरीषश्च ब्राह्मणायामितौजसे । प्रदाय सकलं राष्ट्रं सुरलोकमवाप्तवान् ॥ ८ ॥ ऐश्वर्यशाली राजा अम्बरीष अमित तेजस्वी ब्राह्मणको अपना सारा राज्य सौंपकर देवलोकको प्राप्त हुए ॥ ८ ॥

सावित्रः कुण्डलं दिव्यं यानं च जनमेजयः । ब्राह्मणाय च गा दत्त्वा गतो लोकाननुत्तमान् ॥ ९ ॥ सूर्यपुत्र कर्ण अपना दिव्य कुण्डल देकर तथा महाराजा जनमेजय ब्राह्मणको सवारी और गौ दान करके उत्तम लोकोंमें गये हैं ॥ ९ ॥

वृषादर्भिश्च राजर्षी रत्नानि विविधानि च । रम्यांश्चावसथान् दत्त्वा द्विजेभ्यो दिवमागतः ॥ १० ॥ राजर्षि वृषादर्भिने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न तथा रमणीय गृह प्रदान करके स्वर्गलोकमें स्थान प्राप्त किया है ॥ १० ॥

निमी राष्ट्रं च वैदर्भिः कन्यां दत्त्वा महात्मने । अगस्त्याय गतः स्वर्गं सपुत्रपशुबान्धवः ॥ ११ ॥ विदर्भके पुत्र राजा निमि अगस्त्य मुनिको अपनी कन्या और राज्यका दान करके पुत्र, पशु और बान्धवोंसहित स्वर्गलोकमें चले गये ॥ ११ ॥

जामदग्न्यश्च विप्राय भूमिं दत्त्वा महायशाः । रामोऽक्षयांस्तथा लोकान् जगाम मनसोऽधिकान् ॥ १२ ॥ महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजीने ब्राह्मणको भूमिदान करके उन अक्षय लोकोंको प्राप्त किया है, जिन्हें पानेकी मनमें कल्पना भी नहीं हो सकती ॥ १२ ॥

अवर्षति च पर्जन्ये सर्वभूतानि देवराट् । वसिष्ठो जीवयामास येन यातोऽक्षयां गतिम् ॥ १३ ॥ एक बार संसारमें वर्षा न होनेपर मुनिवर वसिष्ठजीने समस्त प्राणियोंको जीवन दान दिया था, जिससे उन्हें अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १३ ॥

रामो दाशरथिश्चैव हुत्वा यज्ञेषु वै वसु । स गतो ह्यक्षयाँल्लोकान् यस्य लोके महद् यशः ॥ १४ ॥